मिया और मुहम्मद(mea or muhamd)part9

और मिबां मुहम्मद जान को कोटी में व्याख्यान देने लगे । टनको दरों खे बा
वह कुछ मिनटों से अधिक नहीं । स्वामी जी ने उनको कहा था कि आप अमी लड़के हैं, जिसके आप शिष्य हैं दा खह
सरदार दयाल सिंह जी तथा । कोठी भी उन्होंने ही किराये पर लो थी । परस्पर कुछ यमंसम्बन्धी बातवीत भी होती थे पर,
जीवित हैं अर्थात् बाबू केशावचन्र सेन । आप उन्हें बुलावें या मुझे वहां भेें और मेरी उनसे घर्मसम्बन्धी अर्थान इन्दि
ज्ञान पर बातचीत करेंगे तो आपका अच्छी प्रकार सन्तोष हो जावेगा कि कौन सच्चा है। तब सरदार साहब दुपदाखे

आये और अधिक बल नहीं दिया ।'
पादरी क्लार्क साहब से खाने-पीने के विषय में चर्चा हई थी । स्वामी जी के सत्योपदेशों से वदिशेषतया टलदे
और साधारण लोगों को बहुत लाभ हुआ जिनके कि मन में ईसाइयों ने भारी सन्देह उत्पन्न का दिये ।
पहली बार-कोई विशेष शास्ार्थ नहीं हुआ परंतु सरदार हरचरण दास ने नियोग पर कछ आक्षेप किदे दे ड़ि
यह आपने अब्बा नहीं किया जो संडे को खसम कराया।स्वामी जी ने कहा कि हमने ऐसा नहीं कहा, प्रत्युत बह कहा ई
विधवा का विवाह विधुर पुरुष से होना चाहिए? क्वारे से नहीं । ये प्रश्नोत्तर साधारण थे ।'
दूसरी बार जब आये तो उस समय जालंधर में एक ईसाई लड़के को साधारण हिन्दुओं की सहायता
करके आये थे। यहां आकर शुद्धि पर व्याख्यान दिया। बाबू रुलियाराम वकील की बुद्धि का उनको बड़ा ध्यान
उन्होंने नियमपूर्वक शास्रार्थ न किया।'
पादरी बोरिंग महोदय की निराशा-'इस बार बाबू सिंह के प्रयत्न से पादरी बेरिंग ने, पंडित खड्गसिर ।
बारह वर्ष पूर्व ईसाई हो चुके थे और ईसाइयत के बड़े कार्यकर्ता गिने जाते थे, प्राम धोखे से बुलाया कि वह आकर छः
जी से शालार्थ करें । जब वह आये तो पादरी शेरिंग ने कहा कि लो, अव पंडित जी आते हैं, अब आशा है कि अब्छेतठ
शास्रार्थ होगा।

पंडित खइगसिंह जी से मैं बाबू सिंह के मकान पर जाकर मिला ।उन्होंने मुझसे पूछा कि आप जानते हैं वह ई
है, जिसके लिये मुझे बुलाया है? मैंने कहा कि उनका नाम स्वामी दयानन्द सरस्वती जी है और वह सरदार भगवान
के बगीचे में उतरे हैं। उन्होंने कहा कि मुझे उनके पास ले चलो। मैंने कहा, प्रसन्नता से चलिये। मैं और वह ४ बरे के
लगभग स्वामीजी के पास पहुंचे। वहां जाकर ऐसा आश्चर्य हुआ जो आज तक कभी नहीं देखा था अर्थात् पंडित ढदमंक्द
ने जाते हो नमस्कार किया और स्वामी जी के पास बैठ गये। स्वामी जी के साथ जो लोगों की बातचीत हो रही दा. वह।
पर खड्गसिंह स्वामी जी की ओर से उत्तर देने लगे । एक ब्राह्मण ने कहा कि हम तो स्वामी जी के साथ बातचीत कत है।
खड़क सिंह ने कहा कि जब हमसे तुम्हारा सन्तोष न होगा तब स्वामी जी से पछ लेना । जब सभा विसर्जित हुई
खड़क सिंह को अपने साथ घर ले आये और ईसाई मत उनके भीतर से पूर्णतया निकल गया। वह पॐ स्वनि ।
अनुयायी हो गये और तत्पश्चात् अपनी दोनों पुत्रियों का विवाह हिन्दुओं में किया और आर्यसमाज (वैदिकधर्म)
देना आरम्भ किया।'

पादरी साहब गये तो शास्तार्थ की आशा से, परन्तु इसके विषरीत अपने मन में ही हाच धो बैठ
कोई पादरी शास्त्रार्थ के लिए नहीं आया-'री रेटिंग तथा अन्य पादरी बड़े घबराबे और विवश होकर उन्टेने
शास्त्रार्थ के लिये पादरी के० एन० बैनर्जो को कलकते में तार दिया। उसका उत्तर आया कि में आता है
बहुत काल ठक रहकर अब (अमृतसर से) जाने वाले थे इसलिए उनको कहा गया कि पादरी के० एन० बैनजों

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