मिया और मुहम्मद(mea or muhamd)part8

एक व्याख्यान में स्वामी जी ने यह कहा कि संग कही हैं कि उगरेज् धनवान होते जाते हैं और देशी निर्न 1 इस वात की
बिन्ता न करनी चाहिये क्योंकि जितने आगेज घनवान् होगे उतने लिलाराब्रिय होगे । विलासध्रिय होने ते आलरी और
आलस्य के कारण निर्बल हो जायेगे और देशी रोग होने के रण परखा। डॉग और पार
पर। इस र पहि।। थारीलाल राय, एस्ट्रा [22w.fमसर, अतर नामी
। यान पर ऐसी बात करना जति न था। जी ॥ उत्तर दिया कि राब्ी बात
प्रकट करने में मुझको भय न था।

अ ग के मद में व्यसन , एक बार स्वामी जी के उपदेश से, सम्भवत मादक पदार्थ
के सेवन के विरुद्ध था, कषित होकर स्तनों को मोटा मारना चाहा पर लोगों ने पकड़ लिया। सामान
कृत विदित हुआ तो उससे कुछ भी पूछताछ न की, प्रत्युत छुड़ा दिया।'

पर खा लेने से मित्रता नहीं हो सकती-पादरी गलाासाहब ने रजामी जी को कहा कि हम और आप
एक मेज पर खाना खाएं । स्वामी जी के कहा कि इसे या रो2 पाटी रब ने कहा वि इससे मित्रता बढ़ा । ।
जी ने उतर दिया कि सुन्नी और शिया मुसलमान और कीव लैण्ड वाले एक पात्र में खा लेते हैं और तुम ओर रोमन
कैथोलिक एक मेज पर खा लेते हो पर हृदय से एक दसरे के शो केवल गेज पर खाने से हमारी दर धम।
वालों से किस प्रकार मित्रता हो सकती है ? पादरी ब नाये गये और सर राहब से भी वह चबा हुई थी।

हम केवल अपने परमेश्वर के भरोसे सत्यकथन करते हैं-'एक दिन रनामी जी ने हर की पौड़ी और अमृतसर
के विशेषतात्मक नाम पर आप किया और प्रबल युवतियों से खंडन किया कि न यह (हरिद्वार) हर की पौड़ी ह ओर न
(अमृतसर के) तालाब का जल गत है । यह सारी पुराणों की-सी पोपलीला है। इस पर किसी ने हितचिन्तन की दृष्टि से
स्वामी जी को सूचना दी कि कछ निहंग आपको मारने के लिये फिर रहे हैं और कहते हैं कि स्वामी जी के पास रात को
मनुष्य होते हैं, यदि कभी अकेले हुए तो हम रात को अवश्य मार डालेंगे। स्वामी जी ने ईश्वरीय प्रेम के आवेश में आकर
उस दिन सब मनुष्यों को कह दिया कि रात को यहां कोई न सोये । हमको जिसने यह निर्देश दिया है कि हम जगत् का
उपकार करे, उसी के आश्रम हम सदा रहते हैं, किसी मनुष्य के आश्रय नहीं है। देखें कोई निहंग-विहग हमारा क्या कर
सकता है । परिणाम: उस रात्रि उन्होंने ऐसा ही किया । उस अखंडवीर्य बह्मचारी के सामने किसी की क्या शक्ति थी कि
सामना करने को आवे । यह सब गीदड़ भभकियां थीं।

नव शिक्षित ईसाई बनने से बवे-'स्वामी जी के पधारने से पूर्व पंडित लोग वेद मंत्र सार्वजनिक सभा में नहीं
सुनाया करते थे परन्तु जब स्वामी जी ने आ कर उनका (पडितों का) खंडन आरम्भ किया तब स्वामी जी के सम्मुख विद्वान्
बनने के लिये शूद्रों और मुसलमानों के सामने आकर तो भी बराबर वेद मंत्र पढ़ने लगे थे।
बाबू ज्ञान सिंह ने वर्णन किया जिन दिनों स्वामी जी पंजाब में आये तो मिशन स्कूलों की शिक्षा से बहुत से
लड़कों के विचार अपने धर्म से फिरे हुए थे। मैं, उस समय, मिशन स्कूल, अमृतसर में अध्यापक था। उस समय का पादरियों
का वृतांत मुझसे कुछ भी छिपा हुआ नहीं था । लगभग चालीस छात्रों ने, जो हृदय से ईसाई मत की ओर आकृष्ट थे और
अपने आप को 'अनबैप्टाइज्ड क्रिश्चियन' अर्थात् बिना बपतिस्मा का (अदीक्षित) ईसाई कहते थे अपनी एक सभा पृथक
स्थापित की थी । उसका नाम उन्होंने प्रेयर मीटिंग' (प्रार्थना सभा) रखा हुआ था । वह उसमें रविवार को प्रार्थना, उपासना
हुई
आदि किया करते थे। वे प्रकट रूप से हिन्दू थे परन्तु भीतर से पक्के ईसाई थे। यदि स्वामी जी न आते तो वे अवश्य

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