मिया और मुहम्मद(mea or muhamd)part7

विवश होकर २० इन तक उत्तर की प्रतीक्षा करते रहे और प्रवेश करने के लिए िक्ट भी छपवाये गये प्ट
पण्डितों की ओर से वही अवस्था रही । इस समस्त वृतान्त रसे और उनकी उस बात-चीत रसे जो वे परस्पर करते हैं किटट
होता है कि उनका अभिप्राय केवल झगड़ा करने का था, न कि उत्तर देने और शास्त्रार्थ करने का । इसलिए है।
हं कि इन घटनाओं से जो निष्कर्ष निकलता है, वह आप लोग स्वयं विचार लें। इति २१ जून, सन् १८७८

प्रकाशक : बाबा नारायण सिंह वकील, मंत्री आर्य समाज अमृत

('आर्य दर्पण', जुलाई, सन् १८७८; खंड १, संख्या ७, पृष्ठ २३ से ३० टन
स्वामी दयानंद के साथ प्रतियोगिता में पुराण-पंथियों की असमर्थता की स्वीकारोक्ति कविवबनमुया न
नामक समाचार पत्र में लिखा है-'पण्डित दयानन्द सरस्वती एक वर्ष से कुछ अधिक समय से पंजाब में हैं वे पर
मुख्य नगरों में अपना मत चलाने की इच्छा से फिरते रहते हैं, यही नहीं, उन्होंने पंजाब को मोहनभोग तुत्य समझा हुश
कारण कि उनका उपदेश यहां के संस्कृत-शार्ट न जानने वाले पुरुषों के मनों पर शीघ्र प्रभाव करता है। इसी प्रदान
वह इस देश को पसन्द करते हैं और आजकल एक पखवाड़े से फिर यहां अमृतसर में आये हुए हैं और अनेक घव
विषयों पर व्याख्यान देते हैं । जैसे, विधवा-विवाह विषयक युक्तियों को उन्होंने बड़ी प्रबलता से प्रकाश किया। हमने उट
पण्डित द्वारा रचित ग्रन्थों और उनके कथित वाक्यों को सुना और समुदाय से उनका किस-किस अंश में विरोध है और दर
क्यों नहीं मिटता इस पर विचार किया तो पता लगा कि दयानन्द पुराणों और तन्त्र आदिक स्मृतिग्रन्थों को अप्रामाणिकते
हैं, अवतार को उत्तम पुरुष मानते हैं। इन्द्र आदि, देवता को नहीं किन्तु विद्वान् पुरुष को कहते हैं। प्रतिमा-पूजन, टाकु
शिवालय आदि की प्रतिष्ठा करने को असत्कर्म ठहराते हैं और चाण्डाल आदि को भी वेदाध्ययन का अधिकारी बत
मैं । फिर विधवा विवाह को श्रुति सिद्ध ठहराते हैं किसी जाति से खानपान में दोष नहीं समझते इत्यादि । उनके सकेत रू
कथन उनके रचित ग्रंथों में स्पष्ट रूप से उपलब्ध हैं अर्थात् उक्त पंडित जी जो कुछ कहते हैं. बुद्धिपूर्वक युक्ति से कहा ी,
तो मैं सोचता है कि यदि हमारी यही बातें हमारे सनातनधर्मानुयायी आर्यों के लिए विरोधहेत हैं तो क्यों नहीं आजतक कि
विद्वत समाज ने दयानन्दकृत ग्रन्थों पर समालोचना की। जब वे युक्तिपूर्वक श्रतिसिद प्रमाण चाहते हैं तो क्यों न ऐसे विषय
निःसंदिग्ध रूप में प्रकाशित हों और इस प्रकार आर्यमात्र का एकमत हो । मैं देखता हूं कि जिस-जिस नगर में वे ?
वहां-वहां अत्यन्त निश्चयपूर्वक स्वमतसिद्ध विषयों पर व्याख्यान देते हैं और थोड़े बहत मनुष्य तो अपने अनुमोदन
लेते हैं और हमारे पुराने चलन के पण्डित लोग सुन-सुन कर या तो मुंह ही मुंह में बडबडाया करते हैं या फिर चुपसरहक
मुंह ताकते रहते हैं। बाहर लोगों में तो दुर्वचन कहते और धिक्कारते फिरते हैं परन्तु उनके सम्मुख होकर कोई भी
विषय में प्रत्युत्तर नहीं दे सकता और जो कोई उनको कुछ उत्तर देना चाहता है वह भी अंडबंड बकता है। मेरे लि।
से बुरा मत मानों, क्योंकि देखो | हमारे सनातनधर्मानुयायी ब्राह्मण और संन्यासी बहे-बड़े विद्वान् और सरप
कहलाते हैं परन्तु ऐसा कोई भी प्रतिष्ठित पंडित नहीं, जो चतुर्वेदार्थ-पारंगत हो, थेदों के शत्ध अर्ष प्रचारित करता हो अंर
अज्ञान रूप में गिरते भारतवर्ष को बचा सके अथवा प्रति पक्षियों के आ्षेषों से भघरे प्रन्च का खण्डन कर अपने सकाठप इन्य
की स्पष्ट व्याख्या कर सके, ऐसा तो एक भी दिखाई नहीं देता । यह दशा तो हमारे धर्माचार्यों बाह्यजों और परिकाजको की
है, रोष रहे घनी और राजा लोग ?-यह समाज कुछ ऐसी बाह्या उपाधि (रोग) से प्रस्त है कि इस वर्ग का इधर तप्छ थीं
ध्यान नहीं है, और इन लोगों की सहायता के बिना कभी काम चल नहीं सकता। इसलिए हो । धर्म विधि
हो?' (संख्या ३९, १७ जून सन् १८७८)

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