मिया और मुहम्मद(mea or muhamd)part6

इस सम्बन्ध में विचारणीय बातें इस प्रकार है=(a) प्रथम तो ख्ामी जी जबव चलने लगे तो शाख्रार्थ की चर्चा
करनी आरम्भ की । (२) ूसरे अपने आप ही तिथि और स्थान हमसे पखे बिना और किसी बात का निश्चय किये बिना
अपवा दिया और आप ही विज्ञापन दिया कि और कोई स्थान नियत हो तो हम शास्ार्थ करसकते हैं अब उसके विरु
दूसरे-दूसरे ऐसे स्थानों का नाम लेते हैं।कि जहां कोई जाने भी न दे। (३) तीसरे स्थान वह बतलावे और प्रबन्ध हम कर
यह कैसे सम्भव है !6) चौथा, निर्णायक का निर्णय वेदों के विरुद्ध अस्वीकार होगा और फिर निष्यक्ष मनुष्य के निर्णायक
बने बिना शास्ार्थ नहीं हो सकता। (५) पांचवें, यह सिद्ध नहीं कि कौन व्यक्ति है जो स्वामी जी के साथ प्रतियोगिता में
निर्णायक होगा साथ ही ऐसा कि जो पक्षपाती न हो। (६) छठे, लोगों को यही कहते रहे कि ययाशव्ति शास्ार्थ किंगे
परन्तु ढंग ऐसा दिखलायेगे जिससे लोगों को विदित हो कि पंडित जी उत्यत है। इसलिए इन समस्त बातों पर विचार करके
और पंडितों के लिखित विज्ञापन को स्वीकार करके घोषणा की जाती है कि मंगलवार १८ जून, सन् १८७८ को६॥
शाम के समय स्वामी जी पुस्तकों और वेदों सहित शालार्थ करने के लिए सरदार भगवानसिर साहब के तबेले में आबंगे,
वहां २ ॥ घंटा ठहरेंगे और पुलिस का प्रबंध होगा। जिस पण्डित को शास्तार्थ करना हो, पधारे और जब तक शास्त्ार्थ न
होगा तब तक प्रतिदिन आना होगा अन्यथा उसके पश्चात जो कर उचित होगा किया जावेगा। रईस लोग भी पथार ।'
बावा नारायण सिंह, मंत्री, आर्य समाज ।

यह घोषणा स्वामी जी की आज्ञा से की गई, दिनांक १७ जून सन् १८७८ ।।

आर्यसमाज की ओर से दूसरा विज्ञापन-१८ जुन सन् १८७८ को श्रीमान् डिप्टी कमिश्नर साहब बहादुर को
सेवा में प्रार्थना करके शास्त्रार्थ का प्रबंध करने के लिए पुलिस ली गई और मिति १७ जून, सन् १८७८ के विज्ञापन के
अनुसार शाम के ६ बजे सरदार भगवान सिंह साहब के तबेले में फर्श बिछाया गया। बड़े-बड़े प्रतिष्ठित और विद्वान् लोग
शास्ार्थ सूनने को आये थे; दो मेज तथा दो कुर्सी आमने-सामने लगाई गई थीं और एक मेज पर पुस्तकें रखी गई थी।
लगभग पांच छ हजार मनुष्यों की भीड़ थी । प्राय: लोग कोठो पर बैठे हुए थे। जब स्वामी जी चार वेद और शास्तादि
पुस्तक लेकर आये तो प्रथम सार्वजनिक सभा में लोगों को प्रत्येक वेद की पुस्तक का निरीक्षण कराया गया। तत्पश्चात्
अब कोई पण्डित शालार्थ को न आया तो स्वामी जी ने व्याख्यान आरम्भ किया । थोड़ा व्याख्यान ही हुआ था कि बाबू
मोहनलाल वकील आये और खड़े होकर कहा कि मैं पंडितों की ओर से वकील होकर आया हूं और वह सभा में आना
चाहते हैं उनको बुलाया जाये । इस प्रतिष्ठित व्यक्ति के कहने पर दो-तीन मनुष्य पण्डितों को जैसे-तैसे लाये । जिस समय
पण्डित लोग आये, बड़ा कोलाहल हुआ और जयकारे बोलते थे और कुर्सी पर चार पण्डित आ बैठे। प्रथम चन्द्रभान को
शरार्व के नियम लिखे दिये गये जिसको पढ़कर उन्होंने कहा कि अच्छा, यहां उत्तर नहीं दिया जाता हम भी अपने
हुए
नियम लिखेंगे और आपको सूचना देंगे। हम नियम लिखकर आपके पास भेज देगे और आपके नियम मंगवा लेंगे। यह
त हो ही रही थी और पण्डितों को आये थोड़ी देर हुई थी कि कोलाहल होने लगा और पण्डितों के सहायक इंट रोडा
शे गे ।ऐसा विचार हुआ कि प्रत्येक रोड़ा प्रतिष्ठित व्यक्तियों को लगे। कुछ खून निकला, कुछ के चोट लगी । दंगे
और फसाद की अवस्था उत्पन्न हो गई, लोग जान से तंग आ गये। पुलिस भी खड़ी देख रही थी । अन्त में बड़ी सतर्कता
में झगड़ा शांत हुआ।

दूसरे दिन बाबू मोहनलाल वकील को एक पत्र, उत्तर की प्रार्थना सहित लिखा गया । उन्होंने उत्तर दिया कि मैं
समय का वकील चा और पण्डितों ने कोई उत्तर मझे नहीं दिया जो मैं आप को दें, में इस काम से असम्बझ्ध ह और
7 लोग आपस में एक दूसरे से झगड़ते हैं, उनका कुछ निश्चय विदित नहीं होता।

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