मिया और मुहम्मद(mea or muhamd)part5

बातचीत आरम्भ हो जाये । पर सरदार महोदय फिर नियम के विरुद्ध चलने लमे । तब स्वामी जीदेटेश
और नियमानुकूल चलने को कहा जिस पर सरकार महोदय प्रसन्न होकर चले आये और फिर कभी वावबीत - दी
अमृतसर में शास्त्रार्थ की निष्फल चर्चा और विज्ञापन
आर्यसमाज की ओर से प्रथम विज्ञापन-एक वर्ष से स्वामी दयानन्द सरस्वती, मियां मुहम्मद जान की कोठ
में ठहर रहे थे और वहां व्याख्यान देते रहे थे। किसी पंडित ने आकर शास्त्रार्थ न किया और बवाव के लिये यह कहते रे
कि हम कोठी नहीं जाते, यदि स्वामी जी नगर में आये तो शास्तार्थ कर सकते हैं। फिर इसी बात का विचार करके स्ताम

जी मलोई बुगा में आकर व्याख्यान देते रहे परन्तु कोई पंडित न आया।
अब एक मास का समय हुआ फिर स्वामी जी अमृतसर में आये और मलोई बंगा में नियत दिनों पर
देते रहे ।किसी पंडित ने शास्त्रार्थ का नाम न लिया परन्तु जब यह सुना कि अब स्वामी जी चले जायेगे तो लोगों को
लगे कि हम शास्त्रार्थ करेंगे। इसके उत्तर में आर्य समाज की ओर से विज्ञापन दिया गया कि जिस व्यक्ति को शास्त्रार्थ
हो
समाज में आकर समय और नियम निश्चित करे परन्तु कोई व्यक्ति न आया, अपितु एक विज्ञापन छपवा दिया कि
१४.१५ जून सन १८७६ को शास्त्रार्थ करेंगे और घंटाघर और तेजसिह के शिवालय में करने को कहते हैं और बार
साधु को मध्यस्थ नियत करते हैं, और उसके अतिरिक्त और कोई स्थान स्वामी जी नियत करें तो वहां भी शास्त्रार्थ हो सकता
है, कोई बुगा और जमादार के बाग में नहीं हो सकता।
इसके उत्तर में आर्य समाज की ओर से लिखा गया कि जहां तुम करते हो वहीं शास्त्रार्थ स्वीकार है यदि उपद्रव
होने का उत्तरदायित्व स्वीकार करो, अन्यथा कोई बंगा में शास्त्रार्थ हो तो तुम्हारा कोई उतरदायित्व नहीं है। यदि उपर्यक्
स्थान पसन्द न हो तो सरकारी घंटाघर या अन्य कोई विस्तृत मैदान मिल सकते हैं और पुलिस का प्रबन्ध दोनों पक्ष करेंगे
वेद और वेदानुकूल शास्त्रों के अनुसार निर्णय होगा और यह बात भी दोनों पक्षों में निश्चित हई कि यदि वेद के विरुद्ध
मध्यस्थ भी निर्णय देगा तो भी स्वीकार न होगा, जिसका अभिप्राय यह है कि वेद ही मध्यस्थ हो सकते हैं। जिसके उत्तर
में पंडितों ने लिखा है कि पूर्व वर्णित स्थानों को हम पसन्द नहीं करते। अब सरदार मंगलसिह और भाई बस्तीराम महोदय
के बगा में शास्त्रार्थ करें, अपनी समस्या प्रबंध स्वयं करे, मध्यस्थ अवश्य करें और रईसों को लावें ।

इसके उत्तर में आर्यसमाज की ओर से लिखा गया कि आपके लिखित विज्ञापन के अनुसार सरदार भगवानसिंह
महोदय का तबेला नियत करते हैं और दिनांक १८ जून, मंगलवार, सन् १८७८ को ६ ॥ बजे सायंकाल शास्त्रार्थ करने को
उपयुक्त स्थान पर पधारें । शास्त्रार्थ लिखा जायेगा, समस्त लोग देखकर न्याय करेंगे और एक सभापति नियत होगा।
रईसों को दोनों पक्ष यथा सामर्थ्य लावेंगे और उतर शीघ्र देना चाहिये।

जब यह पत्र लेकर पांच मनुष्य पण्डित चन्द्रभान के पास गये तो उन्होंने मौखिक ही निम्नलिखित बातें कहीं और
कागज वापस कर दिया कि में कागज नहीं लेता और शास्त्रार्थ लिखा न जायेगा न मैने विज्ञापन पर हस्ताक्षर किये हैं औ

चिट्ठी पर मेरे बलात् हस्ताक्षर कराये थे । यदि मुझे स्वीकार होगा तो में अकेला मलो बगा या किसी और स्थान पर शाखा
कर लूंगा और मैं लिखित उतर इसलिए नहीं देता कि बसन्तगिरि ने जो चिट्टी पहले लिखी थी उसमें दोष रहे (जिसका
अभिप्राय था कि व्याकरण की दृष्टि से वह अशुद्ध निकली) और मैं लिखंगा तो शायद यही दशा हो । मैं पण्डितों में सम्भितित
नहीं है क्योंकि वह उपद्रव करना चाहते हैं और मुझे बलात् बलाते हैं, विज्ञापन में दनीचन्द ने मेरा नाम आप ही लिख दिय
और बसंत गिरि साधु ने 'समाज' में अपना साधु भेजकर हमारा नाम अकारण निर्णायक के रूप में लिख दिया है. न मुझसे
पछा है और न स्वामी जी के सम्मुख निर्णायक बनने की मुझमें साम है।

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