मिया और मुहम्मद(mea or muhamd)part4

अमृतसर दूसरी बार "-स्वामी जी रावलपिंडी आदि की ओर से सत्योपदेश करते हुए १५ मई, सन् १८७८
तो दूसरी बार अमृतसर पधारे और सरदार भगवान सिंह के बाग मे निवास करके बंगा में व्याख्यान देना आरम्भ किया।
हजारों मनुष्य स्वामी जी के उपदेश सुनने को आया करते थे।

ला0 मुरलीय, गणित अध्यापक-म्युनिसिपल बोर्ड स्कूल गुरदासपुर, जो उस समय अमृतसर में थे, लिखते हैं,
उन दिनों प्रायः स्वामी जी को बाग से लेने और पहुचाने के लिए जाया करता था। एक दिन मैंने कहा कि महाराज ! मुझ
असत्य छेड़ दी ।?
गुरु मंत्र देव । स्वामी जी ने कहा कि क्या अबतक हमने गुरुमंत्र नहीं दिया। हमारा यही गरुमत्र है कि सत्य को मानो और

एक दिन एक ब्राह्मण आया और स्वामी जी के उपदेश के समय उसने जोर-जोर से संस्कृत बोलना आरम्भ कया
कि महात्मा जी ! थोड़ी देर ठहरिये, मैं अपना व्याख्यान समाप्त कर लं फिर आप से बातचीत करता है। वह बोलता ही
रहा अन्त में समाज के लोगों ने उसको एक और बिठला दिया । व्याख्यान की समाप्ति पर स्वामी जी नियमानुसार आसन
पर बैठ गये और कहा कि उस महाराज को बुलाओ। वह पण्डित जी समीप ही बैठे थे, बोले कि मैं यहां उपस्थित हूं। पूछा
कि आप कहां से पधारे हैं? उत्तर मिला कि कुरुक्षेत्र से केवल शास्त्रार्थ के लिए आया हो । स्वामी जी ने पूछा कि आपने वेद
भी पढ़े हैं? कहा-हां ! पूछा--कि कौन-कौन वेद ? उत्तर दिया कि सारे वेद। उसके पश्चात् स्वामी जी ने पूछा कि
व्याकरण भी पढ़ा है? कहा कि हा'। फिर पूछा महाभाष्य पढ़ा है? उत्तर दिया-हां; इस पर स्वामी जी ने एक प्रश्न
व्याकरण में किया तो पण्डित जी ने कुछ संस्कृत का वाक्य पढ़ा। स्वामी जी ने कहा कि यह क्या है? तो उत्तर दिया कि
सूत्र है। इस पर स्वामी जी ने पेन्सिल और कागज किसी से लेकर उसको दिया और कहा कि इस वाक्य को लिख दो, और
यह भी लिख दो कि यह सूत्र है । इस पर वह घबराया और फिर बातचीत से भागता ही दिखाई दिया और चला गया। मैं
और डा० रामगोपाल, रिश्तेदार, महकमा नाहरबारी, सेकेण्ड डिवीजन, एक ही दिन सदस्य बने थे ।'

उन दिनों मैंने सुना कि स्वामी जी ने एक विज्ञापन दिया है कि नगर के पण्डित यदि कोई (मेरी बात वेदविरुद्ध
समझते हों तो आकर निर्णय कर लेवे अन्यथा यह धर्म का विषय है, प्रत्येक को इसमें सहायता देनी चाहिये । परन्तु कोई
पण्डित प्रकट में सामने नहीं आया। कुछ छोटे-छोटे पण्डित जैसे गिरधारीलाल आदि, स्वामी जी के निवास स्थान पर आये
परनु प्रश्न करते हुए घबराते थे
सुना है कि कटरा नौहरियां स्थित नौहरियों के मन्दिर के एक प्रसिद्ध पंडित स्वामी जी से किसी प्रकार का विरोध
से रखते थे अपितु वे कहा करते थे कि स्वामी जी सच कहते हैं।

इसी बीच मैंने सुना कि ला० गंगाजल के छोटे भाई ला० ईश्वरदास स्वामी जी के पास गये । स्वामी जी ने स्वभाव
अनुसार उन्हें डांट दिया कि तुम्हें क्या ज्ञान है? इस पर घंटाघर पर हिन्दुओं की एक सभा हुई और यह भी सुना कि वहां
कला ईश्वरदास ने कहा कि मुझे कुछ प्रायश्चित करना चाहिये कि मैं स्वामी जी के पास गया था।

ला० जीवनदास जी ने वर्णन किया-'सरदार दयालसिंह रईस ने वेदविषय पर स्वामी जी से बातचीत करने के
ऐड दिन नियत किया और इस विषय पर शास्त्रार्थ हुआ कि वेद ईश्वरीय ज्ञान हैं या नहीं? चूंकि सरदार साहब
माजी विचार रखने के कारण वेदों के विरोधी है, इस कारण उन्होंने विरोधपक्ष लिया और किसी नियम को नियत किये
बातचीत आरम्भ हुई। परन्तु सरदार साहब बिना किसी कारण बातचीत का विस्तार किये जाते थे और वास्तविक
४ ओर न आते थे। तब स्वामी जी ने समय नियत किया कि इतने काल तक आप वोलें और इतने काल तक हम,

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