मिया और मुहम्मद(mea or muhamd)part3

प्रकाश साहब-'आप किस प्रकार का मत बढ़ाना चाहते हैं?
स्वामी जी-हम केवल यह चाहते हैं कि सब लोग पवित्र वेद की आज्ञा का पालन करें और केवल
अद्वितीय परमेश्वर की पूजा और उपासना करें । शभ गुणों को ग्रहण करें और अशुभों को त्याग दें *(आर्यदर्पण तंद

३, संख्या २, पृष्ठ २६, २७ से उद्भत) ।
भक्त द्वारा असमर्थता स्वीकृत और स्वामी जी का व्यवहार–वैद्यराज पंडित सर्वसुख जी करते।
अमृतसर में एक बार स्वामी जी को मोटी हरड़ की आवश्यकता पड़ी। जब उनको कहीं न मिली तो मेरे पास उ
भेजा। उसने आकर मुझसे मांगी परन्तु मेरे घर में मन्दिर देख कर कुपित होकर चला गया और जाकर स्वामी जी को बताया
स्वामी जी ने कहा कि हमने जो कुछ उनके विषय में सुना है वे अच्छे मनुष्य हैं; वे हदय से मूर्तिपूजा के विश्वास नहीं
दूसरा मनुष्य आया, मैंने अपना सौभाग्य समझकर हरड़ के कुछ बड़े और मोटे दाने भेज दिये और कहला भेजा कि भरागत
हम अज्ञानी पुरुष है, हमारा ध्यान निराकार पर नहीं जमता, अन्यथा हदय से तो उस निराकार परमात्मा को ही पूजता हु, मति
को नहीं स्वामी जी हमसे प्रसन्न रहे ।'
पंडित भीमसेन जी कहते हैं-'मै लगभग दो मास अमृतसर में रोगी रहा और पंडित सर्वसुख जी के लड़के पडत
महादेव की दवा करता रहा; जिससे मैं ठीक हो गया। फिर मैं वहां से घर चला आया ।'

१३अगस्त,सन् १८७७ को अमृतसर में 'चमत्कार' (करामात) के विषय पर एक मौलवी साहब से शास्त्रार्थ नियत
हुआ । इस पर बाबा नारायण सिंह मंत्री समाज ने निम्नलिखित पत्र लाहौर समाज को भेजा—'श्रीमान् ला० जीवनदास,
मंत्री-आर्य समाज नमस्ते ! दिनांक १३ अगस्त,सम्ह१८७७को स्वामी जी का शास्त्रार्थ, चमत्कार विषय पर, एक मौलवी
साहब से होगा और स्वामी जी की इच्छा है कि कोई अरबी जानने वाला इस सभा में होना चाहिये और यह विचार किया
गया है कि आर्यों का मिलना कठिन है इसलिए पादरी मौलवी इमामुद्दीन का यहां आ जाना उत्तम है और उनके बुलाने के
लिए यह पत्र इस मनुष्य के हाथ भेजा है। आप स्वयं इस विषय में सहायक होकर जिस प्रकार हो, मौलवी महोदय को यहा
आने की प्रेरणा देवे, प्रत्येक अवस्था में उनको यहां भेजने का प्रबन्ध करें । यह काम आप का ही है। आर्यसमाज १२ अगस्त
सन् १८७७ को स्थापित हो गया है ।-बाबा नारायण सिंह वकील, मंत्री आर्यसमाज, १२ अगस्त, सन् १८७७ ।'

परन्तु मौलवी साहब समय पर न मिले और न उन्होंने जाना स्वीकार किया इसलिए शास्त्रार्थ स्थगित रहा।
'आयहिश्यरत्नमाला की रचना और प्रकाशन-उन्हीं दिनों स्वामी जी ने यहां रहकर 'आयद्दिश्यरलमाला' नामक
एक लघु पुस्तक मिति १५ अगस्त, सन् १८७७ तदनुसार श्रावण सदि संवत् १९३४ को लिखी और उसे प्रेस में दक
गुरदासपुर की ओर चले गये और मिति २७ अगस्त, सन् १८७७ को वापिस लौटे । १२ सितम्बर, सन् १८७७ का
पुस्तक छपकर सब प्रकार तैयार हो गई । स्वामी जी अपने एक पत्र में लाहौर समाज के मंत्री के नाम इस प्रकार लिखते हैं
'आर्यसमाज के सब सभासदों को स्वामी जी का आशीर्वाद पहुंचे। आगे सर्वशक्तिमान् जगदीश्वर की कृप स
प्रतिदिन अमृतसर आर्य समाज का उत्साह वृद्धि को प्राप्त होता है। १०० नियम का पस्तक (आयहिश्यरलमा
आजकल छपकर तथा जिल्द बंधकर तैयार हो जायेगा । पंच सी पुस्तक लाहौर और पचास पुस्तक गुरदासपुर की
जाएंगे और संवत् १९३४, भादों सदी ६, गुरुवार, तारीख १३ सितम्बर, सन् १८७७ प्रात:काल ९ ।। की रेल में
को जाना होगा, सो जानना । जो वेद भाष्य पर विरुद्ध सम्मति के उत्तर के पत्र छपवाकर बम्बई आदि में भेज दिये जाव
समाचार पत्रों में छपवा दिये जावे तो बहुत अच्छी बात होगी। आगे आप लोगो की जैसी इच्छा हो वैसा कीजिये।
१९३४ मिति भादों सदि ३, सोमवार तदनुसार १० सितम्बर, सन् १८७७ । दयानन्द सरस्वती

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