मिया और मुहम्मद(mea or muhamd)part10

उनको तर रिया आप शो आये तब उसका उत्तर आया कि मैं।
२ नहै। मने दरूदो कोइ कि त मर जावे तो क्या इस स्थान पर बहुत-सी
त्या दुबे वा देती है तो मोह हो गोद में जाती है, किसी भयावह स्थान
र २ रनवर दरो मोटयो कि ये दो इस घटना के पश्चात् ई मनुष्य ईसाईयत से फिर कर आर्यसमाज
के सटस हो गये ।

अभागन सिटी के पद समदंड का मिशन स्कूल से निकाल दिया-तत्पश्चात् बाबू सिहा ।।
-नन दमन पराई देगा। यदि तम आवागमन सिद्ध करेंगे तब तो अपने आपको
र स) पुदमन और दियह मानेगे कि एक हो जब तबकज में आपकी नौकरी बनी रहेगी । चकि मेरे विचार
दशकदेश से आवगनन पर दृढ़ थे इसलिये मैने आवागमन को सिद्ध किया जिसका परिणाम यह हुआ कि मुझे
छतमपूदकराना पड़ा। मैने उस दिन से अपनी दुकान चाल कर दी फिर नौकरो नहीं की।

बाबू साहब के द्वारा कई ईसाई शद्ध गये है। उनको सदा यही घन लगी रहती है। परमेश्वर उनके साहस को
दिन दिन उन्नति को ।।

पद के आर्य समाजियों के नाम स्वामी जी का एक महत्वपूर्ण पत्र-स्वामी जो ने पंजाब से चलते हुए एक
चमक आर्य समाज माता के नाम अमृतसर से लिखा है जो एक प्रकार से समस्त समाजों के लिये उनको अन्तिम
वमदत और शिक्षा है। इस कारण उसे हम जैसे का तैसा उद्त कर रहे हैं

मंत्र और समासद आनन्द रहो ! प्रकट हो कि अब हम ११ जुलाई सन् १८७८,बृहस्पतिवार को यहां से पूर्व
को ओर प्रस्थान करेंगे और उधर, लुधियाना आदि नगरों में मिलते हुए आगे को जागे । सम्भव है दो-चार दिन के
तिथे अंबाला सेंटर जावे। अब हमारे और आप लोगों का मिलाप केवल पत्र द्वारा ही हो सकेगा। इसलिये आप सदा
व भेजते स हम भी मेजा करेगे। ब आप को लिखते हैं कि प्रतिदिन समाज की उन्नति करते रहो क्योकि यह
बटा यम आप लोगों ने उठा लिया है। उसका परिणाम पर्यन्त पहुंचाने हो में सख और लाभ है। यहां का समाज प्रतिदिन
नति पर है और कई प्रतिष्ठित पर सफेद हो गये हैं। यहां के पडितों ने शास्ार्य के लिये सलाह दी थी सो वे सभा में
उट बोलनकछ बात का उत्तर दिया केवल मुख दिखता कर चले गये और यहां के लोगों ने जो कई पोषों की ओर
है हाकिम से आर्य समाज की लगती खाई थी जिसका परिणाम सत्य के प्रताप से यह हुआ कि अब कोई आर्यसमाज की
र आव ठाकर भी नहीं देवता । सव सभासदों को नमस्ते ।।
२६ जून सन् १८७८
दयानन्द सरस्वती, अमृतसर

गुरदासपुर में शास्त्रार्थ

(१८ अगस्त सन १८७७ से २६ अगस्त सन १८७७ तक)
स्वामी जी लोहार समाज के सदस्यों को १० सितम्बर, सन् १८७७ के पत्र में सूचना देते हैं कि 'आयद्दिश्यलमाला'
५० प्रतियां हमने गुरदासपुर में भेज दी है, जिससे स्पष्ट है कि इससे पहले वहां पधारे थे और वेदप्रकाश*नामक पत्रिका
जा सन १८७७ में प्रकाशित हुई, उस पर भी गुरदासपुर समाज का नाम लिखा हुआ है)।
गुस्दासपुर में स्वागत-इस बार स्वामी जी अमृतसर में ५ जुलाई, सन् १८७७ से १२ सितम्बर, सन् १८७७ तक
रहे और इसी अवधि में वे गुरुदासपुर भी पधारे । लाला मंगलसेन जी वर्णन करते हैं कि भेरा निवासी ला० हंस्राज साहनी

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