मिया और मुहम्मद(mea or muhamd)

उसी दियो स्वामी जी चे घण्टापर पर उकार शब्द के तत के विषयष थे उपदेश दिया कि पह़ बात बवषा है। तत
पंया शेयर करते है और उस अवण अजय लगते हैं। यह केवल किशोध भाग ।
या वेद शास्त्र में उसको कुरा हो । उस दिन को अत्याधिक गwिa
अपश्य पचास सौ व्यक्तियों को शदा मूतिष्जा से बदल ६ इस ध्यान से लोयों के हदय में उस पर
वहाँ हमने दो ख्याखयान सुने । फिर हम उपसे रावलपिडो आवे के विषय में बात की। wि ५ v 0
सकते कि आयेगे श रहो क्योकि वहां रेख वही जाती ।
दिनांक ५ जुलाई सन १८७७ से ११ अगस्त तक बराबर उपदेश होते रहे परिणाम थे। पयः ॥
में सत्य धर्म का बीज को दिया गया। परिणाम यह हुआ कि लोग आर्यसमाज की स्थापना करने के लिए उपत हो गवे 5
सावन सुदि सवत् १९३५ तदनुसार १२ अरस्तु सन् १८७७ रविवार को यहां आर्यसमाज को पाप ॥
पर बाबू शारदा प्रसाद भट्टाचार्य ला० राम एम० ए० दो माथुर से पधारे। प्रथम सामने अपना
सत्येपदेश दिया। फिर बाबू शारदाप्रसाद जी ने ख्याखू्यान दिया और मिया और मुहम्मद साहब को कोश में हो ॥३॥
स्थापना हुई । लगधय ५० सज्जन सदस्य हुए और निम्नलिखित अधिकारी पियत किये गये बाब कईैयालात वरोत
प्रधान पति शालिग्राम वाल प्रधान बाबू गरायण सिह तोम मे जाईत हदयनारायण उपभो आदि।

फिर समाज के लिए मत्ता बना '* में एक मकान लिया गया और स्वयं स्वामी जी ने सबको या हवा
बालाई मलोई बुगा के मकान के भीतर जो चौक है उसमें स्वयं स्वामी जी ने वेदमत कर प्रथम वर कराया।

गायत्री ही गुरु व है-मरसुखराव का पिता सदा चाहता था कि किसी को बेटे का गुरु बनावे व शिविर
मुरु ) है परन्तु वह किसी को गुरु नहीं बनाता था जब स्वायी जी आाये और उसने उपदेश सुने अपने
समस्त सन्देह निवृत्त हो गये। उसने स्वामी जी को गुरु बनाना चाहा और सि्री का धाल धर लाया महाराज जो के
किया और दीक्षा लो । तत्पश्चात गुरु मन पूर्ण। स्वामी जी ने कहा कि और कोई गुरुम पही, पायती हो रुम है ।शि
वह समाज का सदस्य भी हो गया।
एक दिन स्वामी जी मलोई बुंगा में व्याख्यान देने बग्गो एर जा रहे थे पंडित तुससीराध जी ये समाज के सरस्े
से पूछकर चलती हुई गाड़ी में से नमस्कार करके उतार लिया और अपनी बैठक में ले जाकर महाराज ॥धी
की और रहा कि आप विद्या के सूर्य है मेरा आमा आपको धन्यवाद देता है। ऐसा कह कार मित्र के कुकुर से
रुपये नकद भेट किये और बड़ी पप्रता से नमस्कार करके विदा किया। फिर स्वामी जी व्याख्यान के लिए आबे ।इस बी
की पगर में बहुत धूम हुई और स्वामी जी के सत्योपदेश की एर-पर चर्वा होने लगे।

उनके सत्योपदेश से दो-चार मनुष्यो से मूर्तियां फेंक दी और पूजालाम करने वालतो को सखपा तो सैकड़ो से ऊपर
पहुंच गई।
यह उन दिनों सबसे अधिक विद्वान् पाडत रामदत्त जो थे। जब पाणी पिदेश से ।
की मूर्ति पूजा से श्रद्धा दूर होने लगी तो नगर के पडिवो और उनके शिष्यों ने ओ स्कारी नौकर दे पात से ५३
जिस प्रकार भी हो आप स्वामी जी से शास्त्रार्थ करे उन्होंने बहुतेशरा कहा कि में वेद हो जाए। बोर थे ।
शास्त्रार्थ को सामर्थ्य नहो । पण्डितों ने बहुत तग किया कि हमारा सम्मान हो । आप भाग्यशाचे ।
महात्मा बुद्धिमान् पडित अमृतसर का हरिद्वार चले गये। ऐसे बहुत से एडिओ सत्य सेवा
को स्वीकार करते हैं परन्तु संसार से भी डरते हैं।

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