परमात्मा का ऊंचा(prmatma ka uncha )

नुन र दन करके इन तोक से स्यूल यन्नि क द्वारा जाता है। वह सुदमा
रूप नरमता को प्राप्त होता है
अठारहवां पुष्प १७-३-७२ ई०)

यज्ञश ताला में जो अग्नि प्रदीप्त होती है, उसका स्वभाव है, गति
होना। उसके ऊदंगति होने का कारण यह है कि जितनी विद्युत् की गति
है, कहता है, सूक्ष्म राग्नि की जो चेतना है, उस अन्तरिक्ष में प्रोत-प्रोत है
सूर्य की किरणों में प्रोत-प्रोत है. नाना तारा मण्डलों में अत-प्रोत है।
इसलिए उसकी ऊध्ब्बगति हो जाती है । वायु भी ऊँचे गति को ग्रहण करने
मगती है।

वह जो ऊध्र्वगति है उसी में व्यापार वाद होता है। उसमें ही एक
महान् प्रसार-शक्ति होती है। वह जो प्रसारण-शक्ति होती है बह मानव
के विचारों को वायुमण्डल में ऐसे प्रसारित कर देती है जसे यज्ञशाला को
आणि सुगंधित को लेकर वायु को दे देती है। वायु उस सुगन्धि को
देवताओं को अपत करती चली जाती है ।

(बाईसवाँ पुष्प २८-३-७४ ई०
ग्न ग्न हमारी त्याग-भावनाग्रों को लेकर घुत-सामग्री आदि को
अन्तरिक्ष में रमण कर देती है, उसे देवता ग्रहण करते हैं। देवता उसको
ग्रहण करके हमारे लिए सुख की पुष्टि करते हैं। जब हम साँंसारिक भौतिक
यज्ञ करते हैं तो इस यज्ञ की वासनाएं, दी गई हतिया देवताग्रो त
जाएंगी। हमारी प्राण-सत्ता पवित्र होगी, प्राण-सत्ता पवित्र होने पर
हमारे मल विक्षप शान्त होगा । हमारी आत्मा निर्मल गौर उज्ज्वल वन
करके परमात्मा के समीप जाएगी। वहाँ परमात्मा का ऊंचा स्थान 'ज्ञान
हमको प्राप्त हो जाएगा।
(सातवाँ पुष्प ७-११-६३ ई.)

अग्नि तया वायु का उद्गाता श्री अध्वर्यु रूप :
अग्नि को यज्ञ का अध्वर्यु कहा जाता है। उदगाता का श्रभिप्य
केवल अग्नि और वायु दोनों की पुट हुआ करती है। उस समय वायु
गाता तथा अध्वर्यु कहलाता है। अग्नि वायु को सहकारिता से तथा ।
मिलन से ही अचौर्य कहलाता है। वायु अग्नि के साथ मिश्रण हा
तथा उसमे प्राप्त होन म, व्यापक होने से उदगाता कहलाता है।वा
तो सामगान गाती है । कहीं-कहीं अग्नि को उद्गाता तथा वायु की अ
कहा जाता है व्यक्ति वाणी का सम्बन्ध अग्नि से होता है ।
कहो वायु को उद्गाता माना गया है, कहा प्रग्नि का । इस सम्बन्ध
वाय मुनि तथा उनकी विचारधारा करने वाले अन्य श्राचार्यों ने कहा है
कि यदि हम इस संसार में उज्ज्वल स्वरूप को लेकर चलते हैं तो वाय
तर प्रश्न दोनों की सहकारिता और मिलान होने पर वह एक उदगाता
की श्रेणी या उद्गाता की कृति प्रतिपादित होती है । परन्तु वेद के ऋषि
ने आगे वायु को ही उद्गाता माना है । (पन्द्रहवां पुष्प २१-७-७१ ई०)
मानव की वाणी का सम्बन्ध अग्नि से है । इसलिए ऋषियों ने कहीं-
कहीं इसे उद्गाता कहा है तथा वायु को अध्वर्यु कहा है ।

प्रश्न है कि अग्नि उद्गाता है या वायु ?
इसका सीधा उत्तर यह है कि वायु ग्रीर प्रग्नि दोतों की सहकारिता
और मिलान होने पर उद्गाता की श्रेणी या कृति प्रतिपादित होती है ।
प्राग वायु को ही उद्गाता माना गया है ।
इसकी विवेचना कुछ इस प्रकार है ।

नाभि-केन्द्र में जब एक प्रकार का प्रवाह कृत होने लगता है तो
उस समय शब्द का उद्गार उत्पन्न होता है। क्योंकि वाणी का जो स्वरूप
है वह अग्नि माना गया है। व्यष्टि, समष्टि में पहुंचकर विचार करने
मे विदित होता है कि इस शरीर में जो वाणी है, वह लोक में अग्नि मानी
जाती है। अग्नि से उच्चारण किए गए शब्दों को ही उद्गाता कहा जाता
है ।
यहां पर दोनों बातों में भिन्नता आ जाती है। क्योंकि जब तक
प्राण का सन्निधान अग्नि के साथ नहीं होगा, तब तक किसी शब्द की
उत्पत्ति होना संभव है। जैसे मानव शरीर में एक व्रह्मरन्ध्र स्थान है
जिसमें नाना वाहक सूक्ष्म नाड़ियां होती हैं। इसमें एक सूर्यकेतु नाम की
गाडी होती है जिसका सम्बन्ध सूर्य से है। इस नाडी की बनावट इस प्रकार
॥ है कि जिस समय इस नाड़ी का चत्र, चलता है और वह एक स्थान से
मर स्थान पर जाती है, प्राण का संयम करने से, मन का सन्निधान करने
ये
प्रार्थना मन, प्राण दोनों का मिलान करने से अग्नि प्रदीप्त होती
रंध्र की अग्नि तथा द्यु-लोक का मिलान होने पर अग्नि प्रदीप्त हो
दाती है । प्रार्थना द-लोक की श्रण्ति का सूक्ष्म रूप चृत वनाकर ब्रह्मरत्त्र
यो वेदी में प्रति दी जाती है तो अग्नि प्रदीप्त होकर सूर्यकेतु नाम की।
कड़ो में गति उठान हो जाती है ।।

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