परमात्मा का ऊंचा(prmatma ka uncha ), part9

है। इसके अपनाने के पश्चात् जगत् महत्व को प्राप्त होता रहता
(सत्रहवां पुष्प २६-२-७२ ई.)

२-पुरोहित
पुरोहित उसे कहते हैं जो तेरे हित का
हो। यजमान को उसके
अधीन बनकर कार्य करना चाहिए। उसको पुरोहित नही कहते जो
हित बनकर यजमान को नाना प्रकार की विडम्बना ग्रहों (छल-कपट श्रीर
सन्तापन) में ले जाए । प्रथम पुरोहित तो परमात्मा है क्योंकि वह सत
का स्वामी है, उसका धर्म स्वरूप कहा गया है। उसकी प्रतभा के कारण
ही वह पुरोहित है। वह वास्तव में हित को चाहने वाला तथा करने त
है । अतः वह यथार्थ में पुरोहित है. उस महान पुरोहित की याचना
हुए हमें अपनी यज्ञशाला के लिए बुद्धिमान पुरोहित को चुनना चाहि
जिसके हृदय में पापाचार न हो । केवल धर्मज्ञ गौर मानवीय दृष्टि से उस
मानव का जीवन साधारण प्राणियों से उन्नत हो चुका हो ।

पुरोहित यज्ञशाला में यजमान तथा ब्रह्मा को चुनता है। ब्रह्म
उसको चने जिसकी वाणी में माधुर्य, धार्मिकता और ओज की प्रति
तथा कटता का व्यवहार न हो क्योंकि ब्रह्मा की होती औरर यजमान
प्रति कटता से उसकी हिंसा जनक प्रवृत्ति हो जाती है, जो स्वयं उसे, देद-
पाठी तथा मानव को निगलती चली जाती है।
यदि यज्ञ शाला में होतागण, उद्गाता तथा ब्रह्म में द्रव्य की
लोलुपता आरा गई या द्रव्य की प्रवृत्ति बन गई तो उसका हृदय और अन्तः
करण संकीर्णता में प्रोत-प्रोत हो जाता है और उसी प्रकार की विचारधारा
देवताओं के समीप जाती है ।

यह प्रवृत्ति गौर किसी को नहीं खाती बल्कि नके प्राथमिक बल
को ही इस प्रकार शोषण कर लेती है, जैसे ग्रीष्म काल में सूर्य की किरणे
जल को सोख लेती हैं।
यजमान को प्रतिभाशाली बनना चाहिए, उसका मन शुद्ध होना
चाहिए। जब मन में शुद्ध वातावरण होगा, मानवीय-संकल्प ऊंचा है।
तो उससे प्रसारण-शक्ति, व्यापकता और धर्म उसके निकट आता
जाएगा।

जब यजमान का मन चंचल हो, उसी समय उसको ग्रग्नि
हजहा के साथ प्रकृति होनी चाहिए,
होनी चाहिए ।
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उस पर यजमान के नेत्रों की दृष्टि
(ग्यारहवां पुष्प २०-१०-६८ ई०)
प्राचीन काल में हमारे यहां परम्पराओं से पुरोहित-प्रथा थी । प्रत्येक
दाह में पुरोहित रहता था । पुरोहित
का प्रभिप्राय यह है कि वह परा-विद्या
विष्ट करा दे और गृह को धर्म और मानवता के क्षेत्र में लाने का

प्रयास करें।

(उन्नीसवां पुष्प २०-३-७२ ई० (

३-ब्रह्मा :
ब्रह्मणेऽस्वते
नम: ।
जो ब्रह्मा यज्ञशाला मं विराजमान हो करके अपने कर्म-काण्ड के
न अपने ऋत्विज होता ग्रहों को चुनौती (उत्तेजना, बढ़ावा, प्रचार) देता
। उसे नमः । ऋषियों ने कहा है कि जिस यज्ञशाला में ब्रह्मा कर्मकाण्ड से,
जतने आचरणों से, अपने व्यवहार में पवित्र न होगा तो वह यज्ञ संसार में
असफल ही रह जाएगा ।

हे ब्रह्मा ! तुझ सदाचारी वनना है, ब्रह्मचारी बनना है । यज्ञशाला
# तिराजमान यजमानों को भी पवित्र मनाना मेरा कर्तव्य है । तेरे भाव
उनके हृदय में अंकित हो जाने चाहिएं । अतः उसी ब्रह्मा को नमः जिसके
हृदय में संसार के कल्याण करने की भावना हो, जिसकी वाणी अमोघ
हो, जो राष्ट्र तथा संसार के लिए लाभदायक हो ।
(आठवा पुष्प १४-११-६३ ई०)

४-अध्वर्यु :
| १-अध्वर्यु उसको कहते हैं जिसकी ऊच्र्वगति हो, जो अपने ब्रह्मचर्य
व्रत में रहने वाला हो, जिसके उद्गम और उर्ध्व विचार हों, जो सदव
"इदन्नमम '' का उच्चारण करने वाला हो 'इदन्नमम' का प्रभिप्राय
यह है कि संसार में-'हमें', 'मैं' का प्राधिकार किसे काल में नहीं
होता। इस संसार में कोई वस्तु कभी किसी की नहीं हो पाती। यह सब
सम्पदा केवल यज्ञ का ही रूप है, इसमें किसी का कोई स्वामित्व नहीं हो
पाता।

अध्वर्यु के मन में तथा हृदय में इतनी व्यापकता होती है, उसकी
यह धारणा रहती है कि सम्पदा जो है यह मेरी कभी नहीं हो सकती
| द्रव्य तथा औषधि आदि पदार्थ हैं, उनकी उत्पत्ति पर विचार करने

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