परमात्मा का ऊंचा(prmatma ka uncha ), part8

श्रीमान पूज्य ब्रह्मचारी कृष्णदत्त जी ने किसी जन्म में ऋषि प्र
रूप में अनुसंधान करने पर जाना कि यजमान ही यज्ञ का अधिपति

जितना उसका हृदय पवित्र होता है उतना ही यज्ञ म महान् सुन्दरता श्राली
चली जाती है।
यदि जब यजमान के मस्तिष्क में विवाद रहता है तथा नाना
प्रकार की द्वेष की मात्रा रहती है, नाना क्रोध की मात्रा रहती है ।
में
यज्ञ का जो देवता है, वह यजमान क सुकृत का प्रपन म हनन कर लेता
है । जब सुकृत हनन कर लेता है तो यजमान की जो प्रतिष्ठा होती है वह
सव न हो जाती है।
(बाईसवां पुष्प-प्रथम प्रवचन)

जिनका ऊर्ध्वगति वाला हृदय हो तथा परमात्मा की उज्ज्वलता में
उसकी निष्ठा हो, वे ही यज्ञ के अधिकारी हैं। जैसे यजमान का हृदय तपा
हुआ होता है उसी प्रकार उसके यज्ञ का कर्मवाद भी तपा हुआ होना
चाहिए, उसी से यह संसार की महत्ता ऊंची बनी रहती है ।

(वासवां पुष्प १९-२-७० ई०)
यज्ञ के यजमानों को अपनी ऊध्र्वगति बनानी चाहिए, उसकी वाणी
से लेकर प्रत्येक इन्द्रिय की ऊर्ध्वगति होनी चाहिए क्योंकि ये इन्द्रियां ही
यज्ञ के होता का कार्य करती हैं तथा उनके विचार-समिधा का कार्य करते
हैं। इसका तात्पर्य यह है कि जो इन्द्रियों के विषयों की ज्ञानपूर्वक इन्द्रियों
के देवताओं को आहुति देते हैं तो उस आहुति का सूक्ष्म रूप होकर देवताओं
को प्राप्त होता है 1

उस आहुति के सूक्ष्म रूप के साथ में यजमान का विचार, उसकी
धारणा तथा होताओं के संकल्प रमण करते रहते हैं। यह विचारों की
समिधा ही द्युलोक की समिधा मानी जाती है, वयोंकि 'स्वाहा' शब्द की
तरंगों का सूक्ष्म रूप बनकर द्युलोक में परिणत हो जाता है तथा उसी म
रमण करने लगता है। हमें अपने जीवन को यज्ञमय बनाने का प्रयास करना
चाहिए ।
सात्विक यजमान क गह में किसी प्रकार का आडम्बर नहीं होता
और न वहां अच्छाइयों और ज्ञान का ही खण्डन होता है। जिन यजमान
के यहाँ अन्धकार छा जाता है, वे अच्छाइयों तथा सुन्दरता का र
करने लगते हैं। ऐसे व्यक्तियों को यज्ञशाला में प्रवेश करने का अधिकार
नहीं होता ।
वेद कहता है, हे यजमान ! तुम ब्रह्म तथा उद्गाता के आदेशा
गुसार आपनी गति ऊध्र्व वनाप्र । श्रृंगी जी यजमान वनने का प्रधिकार
उसी को देते थे जो एम वर्ष तक व्रहाचारी रहता था । क्रह्मचारी उसका
कहते हैं जो ब्रह्म में प्रपनी प्रवृत्ति को लाने वाला हो । यजमान में एक:
रहता था
(वर्ष तक कैद की मात्रा भी नहीं पानी चाहिए । उसका पृथ्वी पर विश्राम
वह कन्द-मूल फलों का पान करता था, गो-दुग्ध का पान
था। जव इस प्रकार प्रत्येक इन्द्रिय ब्रह्म में पिरोई हुई होती थी तो
होती थी।
जमान यज्ञशाला में प्रविष्ट होकर जो कामना करता था वह पूर्ण

हे यजमान ! तू ओपन गृह में अंधकार को ग्राने दे। यदि तेरे गृह
* अन्धकार आ गया तो वह ब्राह्मण तथा वेद का अपमान है। जब तेरे
में वेद का अपमान होगा तो तुझे यज्ञशाला में जाने का अधिकार नहीं
न। यजमान पत्नी सहित यज्ञशाला में प्रविष्ट होकर, ब्रह्मचर्य को
अपनाते हुए अपने ब्रह्मचर्य की ऊर्ध्वगति बनाए ।

(सत्रहवां पुष्प २५-२-७२ ई०)

वेद का ऋषि कहता है-हे यजमानो ! द्युलोक में तुम अपनी
प्रवत्ति को ले जाओ। हे यजमान पत्नी ! तुम अपनी ऊध्र्वगति को द्यलोक
में ले जाओ । उस सूर्यमंडल की ऊगात में ले जाओ जिससे तुम्हारे
जीवन की प्रभाती महत्ता में रमण करती रहें । हे यजमानो ! जितनी
तुम्हारी ऊध्र्वगति होगी, उतना ही तुम्हारा गृह स्वर्गमय तथा आनन्दमय
दरोगा तथा जितनी गति ध्रुवा (नीची) होगी, भोग-विलासों में होगी,
उतना ही तुम्हारा गृह नारकीय वनेगा, उसमें नरक का वास हो जाएगा
तया कलह का स्थल बन जाता है। इसीलिए गृह ऐसे होने चाहिएं, जिनमें
संकल्प के साथ यज्ञ होते हैं। वास्तव में संसार में आने का अभिप्राय यह है
कि भोग-विलासों को त्यागकर गुह को स्वर्ग बनाना, राष्ट्र को स्वर्ग बनाए
'यज्ञ आदि कर्म करना मानव का कर्तव्य है।

(सत्रहवाँ पुष्प २५-२-७२ ई०)

यजमान की ऊर्ध्वगति हो जिससे अज्ञान इसके समीप न आए
अध्व गति, ऊर्ध्व-विचार तथा नाना प्रकार के वैज्ञानिक विचार हो
। त्रुटियों को त्यागना तथा महत्ता को लाना उसका महान्

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