परमात्मा का ऊंचा(prmatma ka uncha ), part7

२-ग्यारह प्रकार का साकल्य :-दस इन्द्रियों के साथ ग्यारह ।
समन्वय करके आहुति देना चाहती हूं।
४-दस प्रकार का साकल्य-दस इन्द्रियों से आहुति देना चाहती हैं।
५-एक साकल्य का तात्पर्य-एक सङ्कल्प से आहुति देना चाहती हैं।
वह सङ्कल्प यह होगा कि यह प्रभु का यज्ञ है

(तेरहवां पुष्प-१-११-६९ ई०)
३-सतयुग में महाराजा महीयस के अजय मेध यज्ञ में महर्षि पापड़ी द्वार
परीक्षा
| १-यज्ञ में तत्त्व मुनि ब्रह्मा, अतुल मुनि अध्वर्यु, शुनि मुनि तर
पापड़ी मुनि उद्गाता नियुक्त किए गए थे।
पापड़ी मुनि का तत्व में से प्रश्न : यज्ञ में ब्रह्मा का क्या कर्तव्ट
है ?
उत्तर : ब्रह्मा का कर्तव्य है कि वह देखे कि उद्गाता वेद-न्द्र तो
अशुद्ध उच्चारण नहीं कर रहा है, यह पाप है। जिस प्रकार यदि टद्धिमान्
व्यक्ति का स्वागत बुद्धिपूर्वक न कर मूढ़मति से करते हैं, तो वे वृद्धिमान
हमारे पास आना छोड़ देते हैं, इसी प्रकार हमें शुद्ध वेद-मन्त्रों का उच्चारण
कर उन देवताओं का आवाहन करना चाहिए जिनका हम साकल्य देना
चाहते हैं। शुद्ध उच्चारण होने पर देवता द्रव्य पदार्थों को कभी दो कार
नहीं करेंगे और वह सब कर्म-काण्ड निष्फल हो जाएगा।

उद्गाता से प्रश्न
।।
प्रश्न : उद्गाता औरों का क्या कर्तव्य है ?
उत्तर : हम वेद-मन्त्रों के शुद्ध उच्चारण के साथ यजन करते हुए
साकल्य तथा पदार्थों को देवताओं के समक्ष प्रस्तुत करके उनसे प्रार्थना
करते हैं कि हे देवताओं ! आइए, हमारे साकल्यों को, इन द्रव्य पदाथों को।
ग्रहण करो। हमारे लिए प्रत्येक प्रकार से कल्याणकारी वनों ।

उद्गाता का कर्तव्य है कि वह वेद-मन्त्रों का शुद्ध उच्चारण पूर्व
पाठ करके, वेदों की विद्याओं का प्रसार करे जिससे हमारी अादसा ।
उत्थान हो। हम देवताओं में रमण करने वाले बने ।

अध्वर्यु का उत्तर : मुझे वेदों के अनुकूल बने सामग्री देवता
हनी है जिससे उनका आहार शुद्ध हो । ऐसा होने पर हमें शुद्ध प्राथ-सत्ा
मिलेगी और हम उस महत्ता को प्राप्त कर सकेंगे, जिससे हमारा जीवन,
प्रसार हो ।
राष्ट्र का जीवन, संसार के मानव का जीवन ऊंचा वने ग्रीर विद्या का
यजमान का उत्तर : हम आहुति देने के साथ-साथ प्रार्थना कर रहे
हे विधाता ! हे देवताओं ! हमारे राष्ट्र मे शुद्ध ज्ञान का प्रकाश
सदभावनाओं वाले व्यक्ति हों जिससे हमारे राष्ट्र में घृत देने वाले

की हानि न हो, उनकी वृद्धि हो तथा राष्ट्र प्रत्येक प्रकार से

विशाल हो।
यजमान की धर्मपत्नी ने बताया कि मैं इस संकल्प के साथ आरहुति
ली हुई याचना कर रही हूं कि देव ! हे परमात्मा ! हम शुभ कार्य करते
मेरे स्वामी के राष्ट्र में कोई भी मानव, देवकन्या दुराचारी न हो ।
दृतिक उच्च विचार वाले सदाचारी हों, जिससे मेरे स्वामी का राष्ट्र
महान वने। ऐसे धर्म के कार्य प्रत्येक स्थान पर होते रहें जिससे राष्ट्र में
दृद्धिमानों का प्रसार हो । बिना वेद के प्रचार के मानव में कभी सात्विक
बुद्धि नहीं आती है।
ऋत्विजों के उत्तर : हम श्रुति देते हुए परमात्मा से प्रार्थना कर
हे हैं कि हे विधाता ! हमारे में जो दुर्गा
तथा
दुर्गन्धियां हैं उनको समाप्त
करके हमारे में सुगन्धि प्रविष्ट करें, इससे हमारा जीवन सुगन्धिदायक
तथा महान् बनेगा, हम राष्ट्र के तथा संसार के हितैषी चंगे, हम हर प्रकार
* हितैषी वनकर, संसार को सुख पहुंचाकर देवताओं के समक्ष
पहुंचा ।
(दूसरा पुष्प ३-४-६२ ई०)
संक्षेप में :

१-यजमान :
जजमान को नम
हे यजमान ! तू यज्ञ रचता है
सलेक यज्ञशाला में विराजमान होता है, तो कुछ संकल्प से इस ससार ब
ब्याण की भावना से सपत्नीक यज्ञशाला में पाया है । तू ब्रह्मा क नमः
है, पुरोहितों को महत्ता देता है, तू बुद्धिमानों का आदर करता है।
* यार से धर्म शरीर सदाचार संसार में प्राएगा । बुद्माना
का ब्रदर
र धर्म और सदाचार संसार में न रहेगा, राष्ट्र की एकता न
छो, जीवन की एकता समाप्त हो जाएगी । हमारा जीवन यज्ञमय हा,
पदाराम हो, परमोधर्म मय हो, नम्रता मय हो । इस प्रकार का जीवन
I कल्याण करेगा।

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