परमात्मा का ऊंचा(prmatma ka uncha ), part6

अध्वर्यु :
वह श्रम करने वाला हो। एक सुन्दर प्रतिभा उसके समीप हो -
संरक्षण में सुन्वर सामग्री तथा साधन होने चाहिएं जिससे वह अच्छी प्रक
प्रपन्ना कर्तव्य पूरा कर सके ।
उद्गाता :

यह उद्गार गाने वाला हो, उद्गम उसके विचार हों, वह संसा
में उद्गम से मानवता की प्रतिष्ठा में तत्पर रहे ।

(इक्कीसवां पुष्प १७-२-७० ई०)

महाराजा अश्वपति के वृष्टि-यज्ञ में परीक्षा :
उद्गाता :-इस यज्ञ में चाक्रायण उद्गाता थे जो अत्रि गोत्र में
विषय में उसने बताया कि उद्गाता होने के
नाते मैं तीन उद्गम विचारों की आहुति दंगा। तीन प्रकार के विचा
तथा संसार में, यज्ञशाला में तीन ही प्रकार की आहुतियां दी जाती है
यथा :-१-राष्ट्रीय-श्रुति, २-ब्रह्मा-आहुति और ३-मानव-आ्राहति। जिस
प्रकार यज्ञ में आहुति देने के पश्चात् चटाचट होती है, इसी प्रकार
मानव शरीर रूपी यज्ञ में राष्ट्रीय क्रान्ति की चटाचट होती है। जितनी
यह चटाचट रूपो क्रान्ति होगी उतना ही मस्तिष्क में राष्ट्र पवित्र होगा
और उतनी ही राष्ट्रीय क्रान्ति मानव के लिए पवित्र होगी । यही एक
राष्ट्रीय आहुति है । २-ब्रह्म-आहुति वह है जो मनुष्यों में प्रतिष्ठित होती
है।
महाराजा अश्वपति का प्रश्न :
प्रश्न : जो वेद-मंत्रों के साथ यज्ञ में बार-बार स्वाहा देते हो, इसका
क्या अभिप्राय है तथा क्या मीमांसा है ?

चाक्रायण का उत्तर :

मेरे में ( मुझमें) जो नाना प्रकार की त्रुटियां तया दोष हैं उनको
स्वाहा के साथ अग्नि में भस्म करके ब्रह्म ज्योति को अपनाना चाहता
| हूं। ये सव त्रुटियां अग्नि में उसी प्रकार भस्म हो जाती हैं जैसे सामत्र!
मेरे शरीर रूपी यज्ञ में जो ब्रह्म-रूपी अग्नि धधक रही है उस अग्नि को इत
सब त्रुटियों की आहुति देकर चेतनित करना चाहता हूं।
इस यज्ञ में ब्रह्मा श्रृंगी ऋषि बने तथा पुरोहित वायु गोत्र में
मुद्गल ऋषि वनाए थे जा महाराजा अश्वपति के पुरोहित थे ।
अध्याय परीक्षा :-शुगी ऋषि की बालिका शिव्या इस यज्ञ की



अश्वपति का प्रश्न : तुम अध्वर्यु कैसे बनोगी ?
कन्या का उत्तर:-मुझे यज्ञ के उत्तर दिशा में (दक्षिण पर दिखा को
मुख) आसन दिया।
का भ्रभी प्राय है कि जिसकी उद्योग
होती है क्योंकि सूर्य इस पृथ्वी मंडल का अध्वर्यु कहलाता है । वह पूर्व से
निकलता है। मानव शरीर में प्राप्त होने वाली अग्नि का, जब सूर्य की
का कर्तव्य है ।।
व में समन्वय हो जाता है अर्थात् मिलान हो जाता है, तो यही अवई

व की पत्नी का प्रश्न :-सामग्री का साकल्य कैसा होता है ? कौन से
कल से तुम आहुति देना चाहती है? तुम्हारा साकल्य क्या है ?
उत्तर :- साकल्य २४ (चौबीस) प्रकार का होता है। २४ प्रकार

के साकल्य से आहुति दी जाती है।
प्रश्न-तुम कौन से साकल्य से ग्राहक दोगी ?
उत्तर-संसार में १७ (सत्रह) साकल्य होते हैं उनकी आहुति दी
जाती है।
प्रश्न-तुम कैसे साकल्य से प्राहुति दोगी ?
उत्तर:-११ (ग्यारह) साकल्य होते हैं उनकी आहुति दी जाएगी ।
प्रश्न-कौन से कार्य से ग्राहुति देना चाहती हो ?
उत्तर:-मैं दस साकल्य से आहुति देना चाहती हूँ ।
प्रश्न-कौन से साकल्य से आहुति देना चाहती हो ?
उत्तर:-मैं एक साकल्य से आहुति देना चाहती हूं ?
प्रश्न:-इसकी मीमांसा करो ।
उत्तर:-जब मानव इस संसार में जन्म लेकर इसकी जानकारी करता
है, तो उसे चौबीस प्रकाश का हर्ष होता है-

१-पांच ज्ञानेन्द्रियां, पांच कर्मेन्द्रियां, पांच प्राण, पांच उपप्राण, मन,
बुद्धि, हर्ष और शोकः । (ये चोवीस का साकल्य है)।
| २-सत्रह प्रकार का साकल्य यह है । पांच प्राण, पांच उपप्राण, पांच
सेन्द्रिया, मन और बुद्धि ।

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