परमात्मा का ऊंचा(prmatma ka uncha ), part5

जा दूषपतो से जागरूक रहे । पत: यज्ञ का रूपान्तर यह भी है कि यजमान
को जागरूक रहना चाहिए । जागरूक रहने का अभिप्राय यह है कि वह
नाना प्रकार की पत्तियों तथा पायो । आयोग रण। जाग रहने
का प्रथम यह नहीं कि वह निद्रा में तल्लीन न हो । निद्रा से तो प्रात्मा तथा
मन प्रपन्ना भोजन लेते हैं । निद्रावस्था को निद्रा नही कहते । निदा उसे
कहते हैं जो अपने विषयों से वियोग नहीं रख ता तथा जागरक नहीं रहता।
ऐसा मानव न होने के तुल्य है।

अत: यज्ञ उसी का होता है जो याज्ञिक होता है अर्थात् जो अपने
शरीर का यज्ञ करता है । सितपन उसके समीप नहीं प्राता, तूषितपन प्रा
जाने पर वह यज्ञ नहीं रहता। या शिव वही पुरुष होता है जिसकी ब्रह्म में
प्रतिष्ठा होती है, ब्रह्म में ही जिसकी विचारधारा होती है तथा जिस
अन्तरात्मा ब्रह्म में ही प्रतिष्ठित रहता है ।

३-प्रश्न : संतुष्टि नहीं हुई । यजमान क्या होता है ?

उत्तर यजमान उसे कहता है जो यज्ञ का मन करता है । यज्ञ ना
मान वही करता है जो अन्तरात्मा का मान करता है। जो अपनी अन्तरा
आत्मा से अनुकूल कार्य नहीं करता वह किसी काल में भी यज्ञ पा मान नहीं
कर सकता । अन्तरात्मा का मान वही करता है जो निष्ठावान होता है |
निष्ठावान वही होता है जो ब्राह्मण से भयभीत होता है । उसको ब्रह्म में
प्रवृत्ति होना हो तो यज्ञ कहलाया गया है।

४-प्रश्न : संतुष्टि नहीं हुई । यजमान क्या होता है ?

उत्तर : यजमान उसे कहते हैं जो योनि का मान करता है । योनि
कहते हैं यज्ञ-वेदी को । यह अग्नि की योनि होती है अग्नि की यो।
यजमान का हृदय है। वह ज्ञान-रूपी अग्नि में पर पवन रहता है। ज्ञान ।
ही ब्रह्म है । ब्रह्म की प्रतिष्ठा यजमान के हृदय में प्रदीप्त रहती है।

५-प्रश्न संतुष्टि नहीं हुई। यजमान किसे कहते हैं ?
उत्तर : यजमान उसे कहते हैं जो किसी से दिल नहीं रखता ।
अंतरात्मा से उत्पन्न होता है । अतः अंतरात्मा का जो द्वष होता है उ
क्रोध तथा दुर्गुणों की मात्रा होती है। दुर्गुणों को प्रपनाने बाले का जीन।
नष्ट हो जाना चाहिए या उसे अपने जीवन को सदैव धिक्कान
चाहिए।
जमा न होता है जो सिभष होता है। और गाना ।।। ।।

होता है, जो अपराधी होता है। जो परमात्मा के गम तथा
सिद्धान्त के अनुकूल अपना कार्य करता रहता है, उसे परमात्मा का भप
वों होता। परमात्मा उसे अपनी बकरियों में धारण गर ।। ।।।।

६-प्रश्न : ब्रह्मा पया होता है ? (कौन अौर गा)
उत्तर : जो वेद को अमृत जानकर पान करता है तथा उसको प्रमूत
काम करता है । अशुद्धियों से बूर रहता है। उसके शेत्रों में तथा मन,
वन और फर्म में यथार्थ होती है। ऐसे महापुरुष को यज्ञ में आया था।
न देना चाहिए। यजमान का कर्तव्य है कि वह यज्ञश। ला में उराको

प्रासन दे तथा उसका पूजन करे ।

छा उसे कहा जाता है जो ब्रह्म को जानता है। जिसकी निष्ठा
रा में हो तथा जिसका जोवन ब्रह्म के ध्यान में परिणत हो जाता है।
जिस ब्राह्मण का एक-एक श्वास ब्रह्म से दूर न हो, उसको ब्रह्मा कहा जाता

है ।
ब्रह्मा उसे कहते हैं जो यज्ञशाला में प्रतिष्ठित होता है । यज्ञशाला
उमें कहते हैं जहां निर्माण होता है । विचारों तथा प्रवृत्तियों का चुनाव
होता हो। शाला का अभिप्राय यह है कि जहं प्राभूषणों को अपनाया जाता
हो । आभूषणों को अपनाने के पश्चात् उसकी प्रवृत्तियों में महत्ता का
दिग्दर्शन होने लगता है, उसे ब्रह्मचर्य व्रत धारण करने वाला पुरुष कहते हैं,
र्योंकि उसकी ब्रह्म में निष्ठा हो जाती है। ब्रह्मा उसे कहते हैं जो राजा
का भी पुरोहित होता है, वह राजाओं का भी अधिराज होता है। वह यज्ञ-
गाला में प्रविष्ट होकर कर्मकाण्ड में परिणत होता है । वह विधान का
निर्माण जानता है । ईश्वरीय तथा वैदिक पद्धति को लाने वाले को ब्रह्मा
कहते है। जिसकी ब्रह्म में निष्ठा हो, उसका परमात्मा-परमात्मा में संलग्न
हकर दोनों का मिलान हो गया हो । वह ब्रह्म तथा जनता-जनार्दन म
समाधिस्थ हो जाता है। वह दोनों प्रकार की समाधि जानता है। उसके
विचारों में व्यापकवाद आ जाता है। सामूहिक वाद कर सवक हृदय के
रविवार उसके समीप आने लगते हैं। पशु, पक्षी, मृगराज, मानव सभी
न के लिए उसके उज्ज्वल तथा महान् विचार व्यक्त होने लगते हैं ।
बहाव को प्राप्त होता हुआ ब्रह्म की सृष्टि में किसी भी काल में पाप-

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