परमात्मा का ऊंचा(prmatma ka uncha ), part4

रही। पर भ प [राज के पुत्र / गोष्ट ४ा गया ग्री7 21
पश्चात उस गर्भ, विर्ह सो गया वयव यह मृत्यु का प्राजा
उग विरह में है। मेरी अन्तरात्मा शान्ति नहीं आ रही है।

जय प्राशि एेसा उच्चारण मारने लगे ता मंजू के पिता अंतवतु ।
तो।' मारी शाला में विराजमान ४ाने का बया अधिक
पर कि मेरी यज्ञशाला में तो प्रगति है। पर विराजमान होना ।
यह देवताओं का पूजन है, जग में देवता का पूजन कर रहा था देवता
के चित्रों को चित्रण करता हम्रा श्री विज्ञान सादा में यन्त्रों को जान र
था तो तुमने मेरे से प्राप्त क्यों नहीं ली कि मैं तुम्हारी यत्रणाला में
विराजमान हो सक ? प्रेत केतु ऋषि ने कहा, तु वेद का ऋषि है, वेद ।
मन्त्र स्मरण कर, वेद का मन्त्र या पहत "मन्चा त्रह्म लोका: देवन्तम
पूजा फोटो रूद्र।'', वेद का ऐपि यह कहता है कि यज्ञशाला के समीप
वह प्राणी यांना चाहिए, जिसका चित्त प्रसन्न हो और जिसका चित्त प्रसन्न
न हो, विरह म ही उस मानव को यज्ञशाला से दूर विराजमान दो करके
वेद का मन्त्र स्मरण प्रौर योग की सु-स्वाहा में उनके शब्दों को श्रवण
करना । यह तो आसमान है, यह ऋषि मुनियों
का
देव-पूजन करके देवता
बनने का विमान है। वह यज्ञाला के समीप वही मानव प्राता है, जो
देवता बनना चाहता है और देवता वह होता है, जो मृत्यु को विजय कार
लेता है।

यजमान कौन होता है जो यज्ञ के समीप वहां विराजमान होने जा
रहा है, जो मृत्यु के समीप नहीं हैं, जो जीवन के समीप होता है, जो
प्रकाश के समीप होता है, अंधकार के निकट नहीं । जब ऋषि न
ऐसा कहा कि हे ऋषि ! तुम्हें कोई अधिकार नहीं था । परन्तु चला काई
बात नहीं तू भी राजा
भारत माता का पुत्र है। मुझे बहुत प्रसन्नता है, तुम्हार|
हृदय का प्रभ शान्ति तो अवश्य देगा। जब ऋषि ने यह कहा कि 'तपस्यम
ब्रह्म लोका:' तप में मोह का व्या काय ? मोह करना है तो अपने तपस
है
करो, तप से भी मोह न करो, मन्त्र कहता है, “तपम मोह वृत्ति कता
एक वेद का मन्त्र कहता है "तपं मृत्यु अस्तो न पन्थव वही वता:'।
इससे भी प्रीति न करो, तप से भी प्रीति न करो, तप व
ही जाओर परन्तु तप से भी प्रीति न करो । जव वेद का ऋषि यह कहता
ती मानव मौन हो जाता है और विचारता है कि तपस्या क्या है ?
-१ए तो इचि का हाय, जसम दबे हुए किजल एदल पसरवार शे-
१ ६५ हो गए थे। वर्ष ।।। ।। ।।।।।।।।।।।।
है तस्कार थे वे उपकुध ह। ए पर उब्गुध हो करके 'ऋ्ाकि
दो पता पहे है सपा । ॥र ह का आ्रावरण समाप्त हो गया
का कथे समाप्त हो गया। मुस ५ ५।। ।।।।।।।। ।

(तीसवा पुष्प २०-५-७५

दषय के प्रभुख र्यक्तियों की घोश्शता तथा कत्तंग्य
पूज्य ब्रह्मचारी क्रण दत जी महाराज की पूर्व जण । ।
भुरो के रूप में थे। उनकी सप्तवर्षीय शिष्या (बालिका ) से प्रश्नौसन
१-प्रश्न - यज्ञ में होताजन, पा, पाय धादि का पया कर
है तथा उनको कैसा होना चाहिए ?

उत्तर : यजमान ऐसा होना चाहिए कि वह अपने जीवन में आ
विनोद भी न करे, अभइ-विनोद प्रा जाने पर उसकी मानसिक प्रयृत्तिमत
पन्तव्न्ध परा जाएगा । वह सपनों की यज्ञ में सम्मिलित होता है। जब
यज्ञ समाप्त नहीं हो जाता वह परमात्मा का चिन्तन भी करता रहता
यदि इसके अतिरिक्त वह और कोई विषय लेता है तो उसको यज्ञशाल
दूर कर देना चाहिए क्योंकि वह यज्ञ के योग्य नहीं रहता।

योग्य-अयोग्य का विवेचन हमारे धर्म-शास्त्रों तथा वैदिक-पश्चिम
में प्राणी रहता है। यदि किसी प्रकार की आप की मात्रा पा जाए तो उ
परमाणु यज्ञ में स्वाहा किए जाते है। उससे यजमान के सुशृतों का ह
हो जाता है।

अतः यदि यज्ञशाला में प्रतिष्ठित होने के पश्चात् कोई शाशा
विषय उसके समीप पाए तो उस पर भी गम्भीरता से गानवीय पज्तिय
भतार पर ही विचार-विनिमय करना चाहए । सपत्नीक यजमान फो
हैं
विस्पर पति-पत्नी में भी भद्र-चिनोद नही करना चाहिए ।

=

२-प्रश्न : सन्तुष्टि नहीं हुई । यजमान प्यार होता है ?
उत्तर : यजमान उसे पाहते है जो सांप-होता (ै, इब्य-होसा थ
ता है जो हाथि देता है । वह अपने पाणी मी (५ ५। । । अो यजम
||जी पी हषि देता है जो गाजी गरी १ । । । मा पश।। गह।

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