परमात्मा का ऊंचा(prmatma ka uncha ), part30

चूहे की करतूत और पार्थिव पूजा में अविश्वास के अंकुर मूर्ति पूजा में अविश्यास-इतने में ऐसा चमलम
हुआ कि मन्दिर के बिल में से एक अन्दर (TET) याहर निकल कर फिडी के चारों ओर फिरने लगा और पिडी के ऊपर व
क्षमता भी खाने लगा । मैं तो जागता ही था इसलिए मैंने सब खेल देखा ।'

इस समय मेरे चित में भिन्न-भिन्न प्रकार के विचार उत्पन्न होकर प्रश्न उठने लगे। तब मैंने अपने मन में का
और यह शंका उठाई कि जिसकी हमने कथा सुनी थी वही क्या यह महादेव है? या वह कोई और है, क्योंकि वह तो मनु
के समान एक देवता है जिसके विकराल गण, पशुपति, वृषभ वाहन, त्रिशूल, हाथ में डमरु बजाता, कैलाश का पति
इत्यादि प्रकार का महादेव जी कथा में सुना था क्या सम्भव है कि यह पारब्रहा हो ? जिसके शिर पर चूहे दौडे-दौहे फिर
है। चूहे को यह लीला देख मेरी बाल बुद्धि को ऐसा प्रतीत हुआ कि जो शिव अपने पाशुपतास्त्र से बड़े-बड़े प्रचण्ड दैत्य
को मारता है क्या उसे एक साधारण चूहे को भगा देने की भी शक्ति नहीं।।
पिता से नि:शंक प्रश्न उत्तर तथा संतोष--ऐसे बहुत से तर्क मन में उठे । में इन विचारों को बहुत समय तक
रोक सका। इसलिए मैंने अपने पिता को जगाया और बिना किसी प्रकार की झिझक के उनसे यह प्रार्थना की कि मेरे धर्म
को सच्चे उपदेशों से दूर कीजिए और बताइये कि यह भयानक मूर्ति महादेव की, जो इस मन्दिर में है क्या उसी महादेव के
सदृश है जिसे पुराणों में पारब्रह्म कहते है अथवा यह कोई और वस्तु है ?
यह सुनकर पहले तो मेरे पिता ने क्रोध से लाल होकर मुझ से कहा कि तू यह बता क्यों पूछता है और यह प्रश्न
क्यों करता है? तब मैंने उत्तर दिया कि इस मूर्ति के शरीर पर चूहे (जिसे काठियावाड़ की भाषा में ऊन्दर कहते हैं) दौड़े
फिरते हैं और इसको खराब तथा Vष्ट करते हैं। इसके स्थान पर कथा का महादेव तो चेतन है, वह अपने ऊपर चूहा क्यों
चढ़ने देगा और यह शिर तक नहीं हिलाता और न अपने आपको बचाता है। मैं इससे उस सर्वशक्तिमान् और चेतन
परमेश्वर के विचार प्राप्त करना असम्भव समझता हूं; इसलिए यह बात आप से पूछता हूं । तब पिता जी ने बड़े यल के
साथ मुझ को इस प्रकार समझाया कि कैलाश पर्वत पर जो महादेव रहते हैं उनकी मूर्ति बना, आवाहन कर पजन किया
करते हैं, अब कलियुग में उसका साक्षात् दर्शन नहीं होता इसलिए पाषाणादि की मूर्ति बनाकर, उसमें उन महादेव की भावना
रखकर, पूजन करने से कैलाश का महादेव ऐसा प्रसन्न हो जाता है कि मानो वह स्वयं ही इस स्थान पर विद्यमान हो और
उसी की पूजा होती है । तेरी तर्क बुद्धि बहुत बड़ी है, यह तो केवल देवता की मूर्ति हैं।
शिव को प्रत्यक्ष देखकर ही उसकी पूजा करूंगा', निश्चय-इस उपदेश से मुझ को कुछ भी शान्ति न मिली।
प्रत्युत मेरे मन में और भ्रम हो गया कि इसमें कुछ गड़बड़ अवश्य है। मुझे उनकी बातों में कछ कपट और लाग-लपेट ।
प्रतीत हुई। तब मैने संकल्प किया कि जब मैं उसको प्रत्यक्ष देखूंगा तभी पूजा करूगा अन्यथा नहीं। थोड़े समय पश्चात्
मुझे बालक होने के कारण भूख और थकान से दुर्बलता प्रतीत होने लगी इसलिए पिता जी से पूछा कि अब मैं घर जाना
चाहता हूं । उन्होंने कहा कि सिपाही को साथ लेकर चला जा परन्तु भोजन कदाचित् न करना । मैंने घर जाकर माता से कहा
कि मुझे भूख लगी है। माता जी ने कहा कि मैं तुझे पहले ही से कहती थी कि तुझ से उपवास न होगा परन्तु तूने तो हठ ही
किया।

1 आनरेबिल सर सैय्यद अहमद खां साहब ने स्वामी जी के इस प्रसंग के विषय में लिखा है कि यदि यह ईश्वरीय प्रेरणा नहीं
शी तो क्या थी जिसने स्वामी दयानन्द सरस्वती के मन को मूर्ति-पूजा से फेरा । हिन्दुओं के वेदों के उन स्थलों को देखो जहां उस ज्योतिस्वरूप
निराकार के अद्वैत स्वरूप और उसके गुणों का वर्णन किया है।

(तहजीब अल अख्लाक १२९७ हिन्दी, पृष्ठ १५२ से १५६)

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