परमात्मा का ऊंचा(prmatma ka uncha ), part3

का विधान
भौतिक-यज्ञ वो महपियों द्वारा प्रतिपादित विधि-विधान में रखा
चाहिए । तभी उससे प्रजा को लाभ हो सकता है । यश करने से पूर्व गुन्दर
तथा महान् योजना बनानी चाहिए ।
ऊंची भावनाओं से उन देवताओं का पूजन करना चाहिए, जिन्ह, तुम
प्राह्मान करके द्रव्य-पदार्थ अर्पण करना चाहते हो। जब तक हम का
ऊंचे व्यक्ति के लिए या ऊंचे देवता के लिए सुंदर कार्य नहीं करते, तब तक
वह देवता हमें न कोई महत्व, न वाणी, न प्रकाश, न प्राण छ। प्रदान
करेंगे। यज्ञ के लिए सर्वप्रथम उद्गाता, अध्वर्यु, ब्रह्मा तथा यजमान का
चुनाव होना चाहिए। यजमान को सपत्नीक होना चाहिए।
यज्ञ करने से पूर्व वेद-मन्त्रों को जानो। उसके जानवर वेदों के
अनुकूल उनके लक्षण करो। जिस पद के तुम अधिकारी हो या तुःहं चना
जाता है, वह चाहे तुम्हारे लिए हानिकारक है, परन्तु तुम्हारा नव्य है।
कि उनका पूर्णरूपेण
पालन करो।
(दूसरा पप्पू ७-१-६२ ई०)

यज्ञशाला में कमांड की पद्धति का मानव जीवन से घनिष्ट
सम्बन्ध है। यज्ञशाला में चार प्रमुख व्यक्ति होते हैं. १-ब्रह्मा, २-अध्वय ,
३-उद्गाता और ४ यजमान । ये चारों व्यक्ति महान होते हैं।

इनको चुनने वाला व्यक्ति तपस्वी प्रानन्दवत् ब्राह्मण होता है।
ऐसे व्यक्ति को चुना जाता है, जो मन-वचन कर्म से यथार्थ हो तथा अपनी
मानवता के संकल्प में पूर्ण हो । (इसकी वां पुष्प १७-२-७० ई०)

यज्ञ के समीप प्रसन्न मन से जाना चाहिए :
मुझे वह काल स्मरण आ गया। एक ऋषि का अनुसंधान किया
हा विचार मुझे स्मरण श्रा गया है। एक समय महर्षि भन्ज हुए।
जिनके पिता त्रेता केतु ऋषि हुए हैं, त्रेता केतु ऋपि ब्रह्मवेत्ता भी थे । जन
ब्रह्मवेत्ता थे वहां विज्ञानवेत्ता भी थे । त्रेता केतु एक समय अपने प्रास
पर विराजमान थे, एक वेद मंत्र उनके स्मरण अा गया चित्रम् सन्भ
घृष्म यस्चताः यथा चन्द्रही मृत लोका:' यह वेद का मन्त्र जव मरण ।
गया तो इस पर अनुसंधान करने लगे। भयंकर वन में शान्त मुद्रा में, ना
सामग्री एकत्रित है । विचार लगे कि यह वेद मन्त्र या कहता है
प्रतबेतु ऋषि ने उड़ान उड़नी प्रारम्भ की ओर उडान उड़ते हुए उनमः
औतिक यन्त्र भी विराजमान थे । वे भौतिक विज्ञान वेत्ता भी थे । हिमालय
दरअ। म उन एक अनुसन्धान शाखा थी । उस अनुसन्धानशाला में
• विनिमय करने लगे चित्र में उन पत्रावलियों को दृष्टिपात करने
व याग करने लग । परन्तु जब वेद का मन्त्र स्मरण श्राया तो वे
में रमण करने लगे। जब याग कर रहे थे तो समिधा उनके समीप
पी। उस समिधा को लेकर कि जब उन्होंने उस अग्नि का स्वाहा किया तो
पिघा गा साकल्य जब गति को रमण करने लगा तो इसम एक
तिकी ऋषि अाए, ऋषि का नाम था श्वेतकेतु । श्वेतकेतु ऋषि
नाराज यज्ञशाला में विराजमान हो गए। उनका अन्तरात्मा उस समय तो
इनित था। मूल कारण क्या था कि वे तपस्या कर रह थे, तप करते-करते
हेमराज के प्यारे पुत्र से उन्हें मोह हो गया और इतना अतिमोह हो गया
कि वे उसे अपने फठ में स्नेह युक्त रहते । उस सिहराज के पुत्र की मृत्यु हो
गई । प्रव बह मृत्यु से दुखी हो रहे थे । वे दुःखित हो करके शान्ति के
तंत्र में जाना चाहते थे। ऋषि त्रतु जच योग कर रहे थे तो यज्ञशाला
में विराजमान हो गए तो त्रेता केतु ऋषि जहां याग कर रहे थे वहां अनुसन्धान
भी कर रहे थे । अनुसन्धान करते हुए जब वैज्ञानिक चित्रों में वे जो स्वाहा
उच्चारण करते थे, ऋषि भी मन्त्र उच्चारण कर रहे थे तो वायुमण्डल में
जो परमाणु अौर शब्द के साथ म च त्र गति कर रहा था, उस चित्र में कुछ
विरह के कण उनके यन्त्रों में दृष्टिपात होते थे। योग समाप्त कर दिया ।
वेतकेतु ऋषि, ऋषि से चला कि हे ऋषि! नाम ऋषि हो किया विरह में
विराजमान हो । ऋषि कहता है कि महाराज! यह आपने मेरे विषय में
कैसे जान लिया। उन्होंने कहा कि जहां मै याग कर रहा हूं वहां अनुसन्धान
भी
कर रहा हूं । वहां मैं अपने छात्रों में, पत्रावलियों में तुम्हारे शब्द के
शा कण है, शब्द के साथ में जो चित्र अंतरिक्ष में जा रहे हैं वह चित्र मेरे
(स यन्त्र में गति कर रहे हैं, तुम्हारा चित्र आ रहा है, यह तुम्हारा विरह
क चित्र है, व्याकुलता का चित्र है, मैं इसके मूल को जानना चाहता है।

मेरे

ऋषि वाले कि प्रभु ! वास्तव में मुझे विरह है। मुझे ममता ने
हृदय पा विदीर्ण कर दिया है। उन्होंने कहा कि ऐसा क्यों ? म अपने
"" राजा के यहाँ पुध हे शोर मद केतु राजा के यहां अपने माता-पिता
"शा पा करके मन तपस्या प्रारम्भ की। मैने श्रुतम् प्रात केतु
महाराज को प्रपन्ना पूजनीय स्वीकार करके तप करने गया। तप करते-२
दरा तप नितान्त (पराकाष्ठा) में चला गया । मेरे तप को कोई सीमा

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