परमात्मा का ऊंचा(prmatma ka uncha ), part29

स्थानडन । घामात माण होत अर्यात शिरा के भने । ३ कि यह भी छ।
में आये. नि । । । । । म पिता शेषगरी मुन्न । और लगाना
वा इग मत तपादिर शत शोधताते थे और राजा ने 1 जन अर्गात मिट्टी
न वर का पूरा ।।

टससें व्ष में शिव की पार्थिव पूरा विधिवत शिवरात्रि व्रत रखने के लिए पिता का आग्रह (वित् १८९०

१५ तारणतया विप्न पाहता ता । म पिता चाहते १६ । निरन्स पास करके
मत र यात्रवण और जागरजविया कर अर्थात पकका तैव बन जाऊ, परन्तु मेरी माता विरोध किया
* पत उगाग योग्य नहीं यह बात उन दिनो त गल ने मृत जो गई। पिताधी कुछ
आदि का विषय और वेद का पाठ भी मुझे पढ़ाया करते ४ मन्दिर और मेल मिलाप में जहाँ तहां
मुद्र को ले जया करते और कहा करते दे कि शिव की उपासना सय से श्रेष्ठ है। इसी खीचतान में मेरी अवस्दा
र वर्ष की हो गई

१४ वें वर्ष में प्रवेश कंठस्य शिवरात्रि का ऐतिहासिक ब्रत (१८१८वि०)-१८यर्ष की अवजा तक मैंने
दर्द की संहिता कम्ठम्य कर ली और कछ वेदों का पाठ भी पूरा हो गया था और शब्दरूपावती आदिकट-
व्ाकरन के प्रन्ध भी पड़ लिखे वे जह-जहां शिवपुराणादिक की कथा होती थी वो पिडा मा को पास थिट कर
सदा करते थे। हमारे पर में सहकारी अर्थात लेन-देन का व्यवसाय होता था भिसा की जीविका नहीं दी । जमीदारी भी
थी जिससे अच्छी प्रकार घर के कामकाज चलते थे । पीढ़ियों से जमादारी का पद बराबर ला आता था जो इस देश की
तडसीलदारी के तुल्य है क्योकि उसका काम भूमि कर की वसूली (जाति) यी और कई सरकारी सिपाही मिले हुए थे।

| मेरे पिता ने इस वर्ष मुझे शिवरात्रि का व्रत करने की आज्ञा दी परन्तु में उद्यत न हुआ तब मुझे कना सुनाई गई।
और क्या मेरे जी को बहुत ही मीठी लगी। तो मैंने उपवास करने का निश्चय कर यपपि मेरी माटा मझे कहटी थी
कि उपवास मत का क्योंकि मुझ को वो ही भूख लगती दी। इस कारण मेरी निरोगिता की दृष्टि से निषेध किया करती
दी कि यह प्रात-काल ही भोजन कर लेता है इससे बत कभी नही हो सकेगा। पिता हट करते थे कि पूजा अवश्य करनी
हए क्योंकि कल को रीति है। इस पर अत्यन्त मह करके अन्त में टसके आरम्भ करने की अत्यन्त कठोर आज्ञा दी
और मेरी माठा के कथन पर कुछ विचार न किया।

जब वह बड़ी विपत्ति और भूखे रहने का दिन जिसको शिवरात्रि कहते हैं, आया जो माघ वदी त्रयोदशी के अगले
दिन काठियावाड़ में मनाया जाता है। मेरे पिता ने त्रयोदशी के दिन कथा का माहात्म्य सुनाकर शिवरात्रि के व्रत का निश्चय
करा दिया था। यद्यपि माता ने निषेध किया था कि इससे व्रती नहीं रहा जायेगा तथापि पिता जी ने व्रत का आरम्भ करा ही
दिया जब चतुर्दशी की शाम हुई उससे पहले ही मुझे समझाया गया था कि इसी रात को मुझे पूजा के नियम भी सिखाये
जाएंगे और शिव मंदिर में जागरण में सम्मिलित होना पड़ेगा। मेरे नगर के बाहर एक बड़ा शिवालय है। वहां शिवरात्रि
के कारण बहुत लोग रात के समय जाते आते रहते हैं और पूजा-अर्चा किया करते हैं। मेरे पिता, मैं और बहुत से लोग वहां
एकत्रित है। पहले पहर की पूजा पूरी हुई और इसी प्रकार दूसरे पहर की भी । १२ बजे के पश्चात् लोग जहां के तहां मारे
ऊपके मने लगे और धीरे-धीरे सब लेट गये। मैं, उपवास निष्फल न हो इस भय से न सोया था और सुन भी रहा था कि
सोने से शिवरात्रि का फल प्राप्त नहीं होता। इसलिए आंखों पर जल के छींटे मारकर जागता रहा। परन्तु मेरे पिता का भाग्य
मुझसे वेदों का था। वह सबसे पहला मनुष्य या जो थकान आदि का कष्ट सहन न कर सका और सो गया और जागरण
करने के लिए मुझको अकेला छोड़ दिया और पुजारी लोग भी बाहर जाकर लेट गये।


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