परमात्मा का ऊंचा(prmatma ka uncha ), part27

और विशुद्ध धर्म के विचार से सब दनका मप्तमद्गी और स्याद्वाद सहजता से समम्झ
मैं आता हूं। फिर इतना सरपंच बढ़ाना किस काम का है। इसमें बाढ़ और जना का एक
मत है। थोड़ासा ही पृथक होने से भिन्न भाव भी हो जाता है)
अब इसके आगे केवल जैनमत विषय में लिखा जाता है:-

शिवाची
बौद्ध विदचिद्दे पर तचे विदेकडिरेचनमू । उतादेषडादेप ईप हेय्य च इसतत: 2112
। उपादेय परं ज्योति गैलन (०० र ६०)
जैन लोग चित और “अचित” अर्थात चेतन और जड़ दो ही परतत्त्व मानते हैं
उन दोनों के विवेचन को नाम विवेक, जो जो ग्रहण के योग्य है उस उस का ग्रहण और
जो जो त्याग करने योग्य है उस उस के त्याग करने वाले को विवेकी कहते हैं ।31 जगदट
का कर्ता और रागादि तथा ईश्वर ने जगत किया है इस अविवेकी मत का त्याग और योग
से लुची परम ज्योति स्वरूप जो जीव है उसका ग्रहण करना उत्तम हैं ।२॥ अर्थात जीव
के विना दूसरा चेतन तत्त्व ईश्वर को नहीं मानते, 'कोई मी अनादि सिद्ध ईश्वर नहीं ऐसा
बौद्ध जैन लोग मानते हैं। इसमें राजा शिवप्रसादजी *इतिहासतिमिरनाशक" ग्रन्थ में
लिखते हैं कि इनके दो नाम हैं एक जैन और दूसरा वोट, ये पर्यायवाची शब्द हैं परन्तु
बन्दरों में वाममार्गी मद्य मांसाहारी बुद्ध हैं उनके साथ जैनियों का विरोध है परन्तु जो
महावीर श्री गौतम गणधर हैं उनका नाम बद्री ने 'बुद्ध 'रखा है और जो जैनियों ने गण
घर' और 'जिनवर इसमें जिनकी परम्परा जैनमत है उन राजा शिवप्रसादजी' ने अपने
इतिहास तिमिरनाशक ग्रन्य के तीसरे खण्ड में लिखा है कि “स्वामी शंकराचार्य से पहले
जाने के कारण बैबम्व है। है कष्टों के भीतर का पाठ यहाँ अनपेक्ित है। ये दोनों लोक मृवंदर्जनसंग्रह में 'पद्दी माने गये ।।
+्यर दिकनादजी स्दद जत वे । दन्धडार के बह कद्रर विरोधी थे। वह ही नहीं उस समय प्राप: समी विद्वान् डेनी अोर दीद्धा को एक मात्र
एटा गान पुरातन काल से बनी या दी है। जैसा कि प्रसिद्ध चीनीयात्री हुएनसांग ने निला है—' की बगल में चोदी दूरी पर एक स्थान है।
मामा के सिद्धांतों का ज्ञान हुमा या और उसने मुव से पहले धर्म का उपदेश दिया था। इस बात समूचर सनथ भी लगा है। इस स्थात्र
र र मन्दिर देवताओं का है। इस मन्दिर से सम्बन्ध रखने वालों को बरी कठिनाई का सामना करना पड़ता है परन्तुबे नोन र दिन नगर
व रिठे है. जरा नी हीन नर होने देते। इन लोगों में अधिकतर बौद्ध पुस्तकों में से सिद्धान्तों को उड़कर अपने धर्म में
-लित कर लीया है । ये लोग अनेक थंडा के पार पनी अपनी थंगी क अनुसार नियम पर धर्म से नन बटर बनाये हुए हैं। 2
ट। पौर जो डोटके घमर लठे है। इनका चरित्र पौर ब्यबहार अधिकतर बीद्ध स-बासियों के समान है. वन इतना मेट
प्रिर परने सिर पर चोटी रखते है और नग रहते हैं । पोर यदि कपड़ा पहनत हैं तो वह इडेत रंग का होता है । बन यड़ी थोड़ा सा मंद इनमें पर
हर लोता मे हैं उनकी देवताओं को मूरिया नी प्रकार प्रकार में मुन्दर तथागत बगवानू के गमान मुन्दर है. इस गाने में हैं। जय
. थ १; इंडियन प्रेम, इलाहाबाद, प्र मस्मरण में १९२१)। इस सन्दर्भ में परत येताम्बर शब्द पर टिकी है।
इयों की एक शान है अंतिम वाक्याग पर जी टिप्पणी है--शथात् जैनियों की मूत्तिया नगी रहती हैं सो बी दिनब्दर जन जोरों की है इस
र ईस कार र गै पूरी स्पष्ट ही रही है। किकन की बातवी शटी में हुएनमार भारत में पाया था। इसका अर्थ यह है कि पार से ते
हू रगट में यह दिचार पा कि जैन विशेषकर इनेतान्बर रन संत्रदाय जीदडगट आ एक अबान्तर बेद माना जाता था। हमारे दुन्दकार ने अधिकटर
किटानर त की पालोषना की है इवेतान्बरों में पाज तीन प्रथान नेद है-जूतिप्रजक, स्वानकनासी और तेखान्दी। इनके मिदानों में ुछ न
"रा व दीनी वाम्बा मायान्तर्गत)। इसी प्रकार एकाप विषय में बंद होने पर उनको बोद मानने में कोई विवाद
केहती चाहिये । दही कहा जाए कि जैन द्वन्दों में बीजों का तया बौद्धप्न्दों में जैनों का सण्डन है, अत: इन दोनों को एक गानना प्रनड़त है।
ए करटन मह है कि यह तर्क प्रापात रमतीय होने पर नितान्त पनार है । दिनम्बर मी अपने को जैन कहते हैं, इवेतान्बर बी जन बजते हैं,
करे है अने प्रकने इन्ों में एक दूसरे कीडीखानेदारी कर रखी है। हमारे परन्धकार की एक अन्तनिहित प्रबन ।
यृसि और मी है । वैदिकचर
है की थे चाादाय मनुष्यों को सिर मानने के कारण एक है । बौद्धों ने परमेकर की खता को अस्दीकार तो किया किन्तु उसके स्थान में

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