परमात्मा का ऊंचा(prmatma ka uncha ), part26

पट कहना अयोग्य अर्थात उसमें घटना वक्तृत्व है और पटपन अवक्तव्य है।
मङ्ग यह है कि जो घट नहीं है वह कहने योग्य भी नहीं और जो है वह है और कर
योग्य भी हैं। और सातवां मङ्ग यह है कि जो कहने को इष्ट है, परन्तु वह नहीं है

कहने का योग्य मी घट नहीं। यह सप्तमभङ्ग कहाता है। इसी प्रकार :
गायति गोऽयं पचमी
।।१॥ स्वाभास्ति
जीवो दियो मकर: ॥रा
सादवक्तन्यी जीव: रतीषी नड्र: ।२ स्थादश्ति नाल्ति जीव: चतुर्षों मह: I२ा
क्यादत्ति पावक्तव्यो जीवा पचयो बह्र: ३ स्यान्नास्ति वक्तव्य जीव: पष्टी भङ्ग: ६

सथादस्ति नारित चवकम्यो जीव इति सप्तयो भक्र: a
अर्थात है जीव?, ऐसा कथन होवे तो जीव के विरोधी जड़ पदाथा का जीव में आ
रूप भङ्ग प्रथम कहाता है। दूसरा भङ्ग यह है कि नहीं है जीव जड़ में ऐसा कथन भी हो
, इससे यह दूसरा भङ्ग कहाता है । जब जीप शरीर धारण करता है तब प्रसिद्ध और
शरीर से पृथक होता है तब प्रसिद्ध रहता है, ऐसा कथन होवे उसको तृतीय भंग ।
हैं। जीव कहने योग्य नहीं?, यह चौथा भंग। ‘जीव है परन्तु कहने योग्य नहीं जो ऐसा क
उसको पंचम भंग कहते हैं। जीव प्रत्यक्ष प्रमाण से कहने में नहीं आता इसलिये जर
-प्रत्यक्ष नहीं है, ऐसा व्यवहार है उसको छठा भंग कहते हैं। एक काल में जीव का अन
मान से होना और अदृश्यपन में न होना और एकसा न रहना किन्तु क्षण क्षण में परि
ाम को प्राप्त होना अस्ति नास्ति न होवे और नास्ति अस्ति व्यवहार भी न होवे' यह
सातवां भंग करता है।
इसी प्रकार नित्यत्व सप्तभंगी और अनित्यत्व सप्तभंगी तथा सामान्य धर्म, विशेष धर्म,
गुणा और पर्यायों की प्रत्येक वस्तु में सप्तभंगी होती है। वैसे द्रव्य, गुण, स्वभाव और
पर्यायों के अनन्त होने से सप्तभंगी भी अनन्त होती है, ऐसा जैनियों का स्याद्वाद और
जप्तभङ्गी न्याय कहता है । ( समीक्षा ) यह कथन एक अन्योन्याभाव' में साधम्र्य
और वैध क्या* में चरितार्थ हो सकता है। इस सरल प्रकरण को छोड़कर कठिन जाल रचना
केवल अज्ञानियों के फंसाने के लिये होता है। देखो ? जीव का अजीव में और अजीव का
जीव में अभाव रहता ही है, जैसे जीव और जड़ के वर्तमान होने से साधम्य्य और चेतन
नथा जड़ होने से वैधम्र्य अर्थात् जीव में चेतनत्व (अस्ति) है और जड़त्व (नास्ति) नह।
। इसी प्रकार जड़ में जड़त्व है और चेतनत्व नहीं है इससे गुण, कर्म, स्वभाव के समान
२एब नित्थत्वसप्तभगी अनिर्यत्यसप्तभंगी एवं सामान्य धर्माणी विशेषधम्मणि गुणानां पर्यायाणी प्रत्येक सप्तभगो..(प०र०५* ((
एवं पंचास्तिकाये प्रत्थस्तिकायमनंता- सप्तभंग्यो भवन्ति (प्र० ० १० १९३)।

कपभाव चार प्रकार का है, उनमें से एक अन्योन्याभाव है, इसे इतरेतराभाव भी कहते है। घट में धटपन तो है, किन्तु पटपन नहीं है परद सा रें।
दत का अभाव है, ऐसे ही पेट में पटक तो है, किन्तु घटपन नहीं है। इसे अन्योऽ्याभाव कहते हैं अर्ात् अन्य में (घट में) अन्द का (पटादि का प्रर
ी प्रकार पट़ में घटादि का अभाव अन्योन्याभाव है । तात्पर्य यह है कि घट में घट हे अतिरिक्त सकल पदाद्थं का पभाव है, इस शांडि पतहि ही रही ।
गनी चाहिये । विभिन्न पदार्थों में किन्हीं विषयों की समानता को साधम्र्य कहते है जैसे पूषिपी,
चद जड़त्प इन चारों का साधम्र् है । के विभिन्न पदार्थों को एक दूरसरे से मेद कराने वाला विशेषत्व देघम्द है, जैसे

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