परमात्मा का ऊंचा(prmatma ka uncha ), part25

है। पांचवां जो वास्तिकाय" जो चेतना लक्षण ज्ञान दर्शन में उपयुक्त अनन्त पर्यायों
न परिणामी होनेवाला कर्ता भोक्ता है। और छठा "काल" यह है कि जो पूर्वोक्त पञ्चा
स्तिकायों का परत्व अपरत्व नवीन प्राचीनता का चिह्नरूप प्रसिद्ध वर्तनारूप पर्यायों से
युक्त है वह काल" कहलाता है। (समीक्षक) ने बौद्धों ने चार द्रव्य प्रतिसमय में नवीन नवीन
माने हैं वे झूठे हैं, क्योंकि आकाश, काल, जीव और परमाणु ये नये वा पुराने
भी नहीं हो सकते क्योंकि ये अनादि और कारणरूप से अविनाशी हैं, पुनः नया और
पुरानापन कैसे घट सकता है । और जैनियों का मानना भी ठीक नहीं, क्योंकि धर्माधर्म
ट्रव्य नहीं किन्तु गुण हैं। ये दोनों जीवास्तिकाय में प्रा जाते हैं। इसलिये आकाश,
परमाणु, जीव और काल मानते तो ठीक था । और जो नव द्रव्य वैशेषिक में माने हैं वे ही
ठीक हैं। क्योंकि पृथिव्यादि पांच तत्व, काल, दिशा आत्मा और मन ये नव पृथक पृथक्
पदार्थ निश्चित हैं । एक जीव को चेतन मानकर ईश्वर को न मानना यह जैन बौद्धों की
मिथ्या पक्षपात की बात है।

मतमो राव जैनी लोग सप्तभङ्गी और स्याद्वाद मानते हैं सो यह कि सन् घटः**
स्याद्वाद_ इसको प्रथम भङ्ग कहते हैं, क्योंकि घट अपनी वर्तमानता से युक्त अर्थात्
घड़ा है, इसने अभाव का विरोध किया है। दूसरा भाग "असन् घटः घड़ा नहीं है, प्रथम घट
के भाव से इस घड़े के असद्भाव से दूसरा मङ्ग है। तीसरा भङ्ग यह है कि “सन्नसन् घटः
अर्थात् यह घड़ा तो हैं परन्तु पट नहीं, क्योंकि उन दोनों से पृथक् हो गया। चौथा भङ्ग
"घटोऽघटः जैसे “अघटः पटः" दूसरे पट के अभाव की अपेक्षा अपने में होने से घट अघट
कहाता है, युगपत् उसकी दो संज्ञा अर्थात घट और अघट भी है। पांचवां भङ्ग यह है कि घट
काशप्रदेशष्यहरूपः स चानन्तप्रदेशगरिमाणः (अरषु० २७८) । एकरसवर्णगो हिस्प, कार्य लिङ्गी च। पूरणमलनस्वभावः पुद्गला
स्तिकाय स च परमाणरूप(प्र० र० पृ० १०८) चेतना लशणो जीव-, चेतना च ज्ानदर्शनोपयोगी अनन्तपर्यायपरिणामिककतुस्वभोकतु:-
त्वादिलशणलो जीवास्तिकाय: (प्.र० पृ० १७९)। क पंचास्तिकायाना परत्वाघरत्वे नवशुराणादिलिङ्गव्यक्तवृत्तिवर्तखूपपयाप: काल:
(पतर० पृ०१es)a सर्वदर्शनसंप्रह के महंत दर्शन में निरूपण निषि के प्रदर्शक निम्न भिजित लोक दिये है-"तड़िधानविवसायाँ स्पादस्तीति
गतिभैवेत । स्याप्रास्तीति प्रयोग: स्यात् तत्रिषेध विवक्षिते । कमेणोभववाग्हायां प्रयोग: समुदायभाक यूगपत् तड्विबक्षाया स्थयादवाब्य-
मयक्तित: 11 प्राद्यवाच्यविवक्षाया पउचमो भङ्र इष्यते। अन्त्यावाच्यविबक्षायां पष्ठभड्गसमुझबु: 11 समुच्चयेन युक्तश्च सुमो भए
न्यते ।।'' अर्थात् सभी के विधान के कथन की इन्छा ने 'स्यादस्ति' बह पहली चाल है उसका निषेष कहना प्रभीष्ट हो तो स्थान्नास्ति
ररा बद्र होता है ]। आग से दोनों के कथन की इच्छा में समुदाय हो जाता है अर्थात् 'स्यादस्ति स्वान्नास्ति' (यह तृतीय बङ्ग का रूप होता है।
एक साथ उन दोनों की शिक्षा में शक्ति के कारण ‘यादवक्तव्यः [यह चौथा नङ्ग बनता है। प्रथम को घतल्यक्षिक्षा में 'स्यादस्ति च अद
सम्यः' पञ्चम बङ्ग है। इसरे की अवक्तब्यविवता में स्यान्नास्ति च अवक्तव्य:' से गष्ठमकृ् की उत्परि होती है। सब के समुच्चय से [पस्तिनास्ति
पदन्तव्य) बप्तम भह्र है देवचन्द्र मूर्ति पसार में सप्तरंगी का जो कम दिया हुआ है, उसके अनूसार जो अपर तीसरा बनता है या
होना चाहिये और घन अर्थ तृतीय होना पवन हिये हरषि दयानन्द ने अनित्य घट ' और नित्य जीव' की जो खप्तबंगी दसशधी है। वह नश्व र के धन्शार
र।वहां इन दोनों को गतगी का साथ साथ प्रयोग किया है यथा-उष्ट्प्रोकवाकपोलकुकिबुध्नादिभि- स्वपय्यायै: सफूरावेनापित: विशेषत:
कुम्भक: कुम्झो भध्यते 'सन घर' इति प्रथमो भङ्रो भवति, एवं ओवः स्वपर्यायैः ज्ञानादिभिः अपितः 'सन् जोवः । शव गौ धौव, पोल
बुख प्रादि अपने पर्वों के साथ सला से समर्पित घट घट कहाता है इस से सन् चट:' बह प्रचम भङ्र है, ऐसे हो जोव भी अपने जञानादि पम्पयों हे
काथ (सता से समर्पित जीव 'जीत' कहता है] इस से 'सन् जीव:' यह प्रथमाभज्ग है । इस प्रकार प्रिकरणरत्नाकर के प्रथम भाग के [८ पुष्य में है।
पृष्ठ तक सप्तरंग का निरूपण है। शि दयानन्द ने घट तगा और कौ सतर्मगौ दिखाते हुए जो बाषा सिखी है, वह प्रकरणरत्नाकरान्तर्षत वयचक्सार
के संस्कृत तथा वचावेश उसके गुजराती अनुवाद का भावान्तर हैं।

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