परमात्मा का ऊंचा(prmatma ka uncha ), part24

बैठा था उसको 'लीगने साजन मे* धोखे देखकर बोला, अरे साधु ! अशुद्व घोसता है
“श्री गणेशाय नमः'' ऐसा धोखा । उसने भट लोटा भर गुरुजी के पास जा कहा कि
बम्मन मेरे घोखने को शुद्ध करता है। ऐसा मुनकर झट खाखीजी उठ कृप पर गया
पंडित से कहा तक मेरे चेले को बढ़ाता है ? तू गुरू की लणडी क्या पढ़ा है ? देख
एक प्रकार का पाठ जानता है हम तीन प्रकार का जानते हैं' । 'स्ीगनेसाजन्नम' "सीगने-
सायन्नमें" *श्रीगणेशायनम' । (पंडित) मुनो साधना ! विद्या की बात बहुत कठिन है -
पढे नहीं आती। (खाखी) चल वे, सब विट्वान् को हमने रगड़ मारे, जो भांग में घोट पर
दम सब उड़ा दिये। सन्तों का घर बड़ा है। तू वावड़ा क्या जाने । (पण्डित) देखो !
तुम ने विद्या पदी होती तो ऐसे अपशब्द क्यों बोलते ? सब प्रकार का तुम को ज्ञान होता
(खाखी) अबे तू हमारा गुरू बनता है!?तेरा उपदेश हम नहीं सुनते। (पण्डित) मुनो कहां से
बुद्धि ही नहीं है। उपदेश सुनने समझने के लिये विद्या चाहिये । (खासी) जो सब वेट
शास्त्र पढे, सन्तों को न माने, तो जानों कि वह कुछ भी नहीं पढ़ा। (पण्डित) हां हम
सन्तों की सेवा करते हैं, परन्तु तुम्हारे से हुर्दङ्गों की नहीं करते क्योंकि सन्त सज्जन, विद्वान
धार्मिक, परोपकारी पुरुषों को कहते हैं । (खाखी) देख हम रात दिन नंगे रहते, धनीतापते
गांजा चरस के सैकड़ों दम लगाते, तीन तीन लोटा भांग पीते, गांजा भांग धतूरा की पत्ती
की भाजी बना खाते, संखिया और अफीम भी चट निगल जाते, नशा में गर्क रात दिन
बेगम रहते, दुनिया को कुछ नहीं समझते, भीख मांगकर टिकड़ बना खाते, रात भर ऐसी
खांसी उठती जो पास में सोचे उसको भी नींद कभी न आवे इत्यादि सिद्धियां और साधूपन
हम में हैं। फिर तो हमारी निन्दा क्यों करता है ? चेत बाबूड़े जो हम को दिक्क करेगा
हम तुम को भसम कर लेंगे। (पंडित) ये सब लक्षण असाधु मूर्ख और गवर्गण्डों के
हैं, साधुओं के नहीं। मुनो, “साध्नोति प्राणी धर्मा कार्याणि स साध:* जो धर्मयुक्त उत्तम
काम करे, सदा परोपकार में प्रवृत्त हो, कोई दो गुण जिसमें न हो, विद्वान,सत्योपदेश से सक्का
उपकार करे, उसको साधु कहते हैं । (खाखी) चल वे तू साधु के कर्म क्या जाने ? सन्तों
का घर बड़ा है किसी सन्त से भटकना नहीं । नहीं तो देख एक चीमटा उठाकर
मारेगा, कपाल फुड़वा लेगा। (पण्डित) अच्छा खाखी जाओ अपने आसन पर, हम से बहुत
गुस्से मत हो । जानते हो राज्य कैसा है ? किसी को मारोगे तो पकड़े जाओगे, कैद भोगोगे,
बेत खायेगा या कोई तुम को भी मार बैठेगा, फिर क्या करोगे ? यह साधु का लक्षण नहीं ।
(खाखी) चल वे चेले ! किस राक्षस का मुख दिखाया। (पण्डित) तुमने कभी क्सी
महात्मा का संग नहीं किया है, नहीं तो ऐसे जड़ मूर्ख न रहते। (खाखी) हम प्राप ही महात्मा
ने
है हम को किसी दूसरे की गर्ज नहीं । (पण्डित) जिन के भाग्य नष्ट होते हैं उनकीतुम्हार
सी बुद्धि और अभिमान होता है। खाखी चला गया आसन पर और पण्डित घर के

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