परमात्मा का ऊंचा(prmatma ka uncha ), part23

व तिलक कंठी धारण करते हैं, रामानन्दी बगल में गोपीचन्दन बीच में लाल,
वक्त दोनों पतली रखा बीच में काला बिन्दु, माध्व काली रेखा और गौड बंगाली
ी के तुल्य और रामप्रसादवाले दोनों चांदी रेखा के बीच में एक सफेद गोल टीका
यादि, इनका कथन विलक्षण विलक्षण है। रामानन्दी नारायण के हृदय में लाल रेखा
हतयादि कथन करते हैं।
तक्मी का चिह्न और गोसाई श्रीकृष्णचन्द्र जी के हृदय
राधाजी विराजमान हैं
एक कथा भक्तमाल में लिखी है। कोई एक मनुष्य वृत्त के नीचे सोता था। सोता
दाता ही मर गया। ऊपर से काक ने विष्ठा कर दी। वह ललाट पर तिलकाकार हो गई।
औी। वहां यम के द्वार उसको लेने आए। इतने में विष्णु के दूत भी पडंच गये। दोनों
विवाद करते थे कि यह हमारे स्वामी की आज्ञा है हम यमलोक में लेजायंगे । विष्णु के
सूत्रों ने कहा कि हमारे स्वामी की आज्ञा है बैकुंठ में ले जाने की । देखो इसके ललाट
वैष्णवी तिलक है। तुम कैसे लेजाओगे ? तो तब यम के दूत चुप होकर चले गये। विष्णु
के दूत मुख से उसको बैकुंठ में ले गये। नारायण ने उसको वैकुएठ में रक्खा । देखो,
जब अकस्मात् तिलक बन जाने का ऐसा महात्मा है तो जो अपनी प्रीति और हाथ से
तिलक करते हैं वे नरक से छूट वैकुण्ठ में जाएं तो इसमें क्या आश्चर्य है !! हम पूछते
हैं कि जब छोटे से तिलक के करने से वैकुण्ठ में जावे तो सब मुख के ऊपर लेपन करने
वो काला मुख करने व शरीर पर लेपन करने से वैकुण्ठ से भी आगे सिधार जाते हैं वा
नहीं ? इससे ये बातें सब व्यर्थ हैं। अब इनमें बहुतसे खाखी लकड़े की लङ्गोटी लगा, धूनी
तापते, जटा बनाते, सिद्ध का वेष कर लेते हैं। बगुले के समान ध्यानावस्थित होते हैं,
गांजा, भांग, चरस के दम लगाते, लाल नेत्र कर रखते, सब से चुटकी चुटकी अन्न,
पिसान, कौड़ी, पैसे मांगते, गृहस्थों के लड़कों को बहकाकर चेले बना लेते हैं। बहुत करके
मजूर लोग उनमें होते हैं। कोई विद्या को पढ़ता हो तो उसको पढ़ने नहीं देते। किन्तु
कहते हैं कि “पठितव्यं तदपि मर्तव्र्य दन्तकटाकटेति कि कर्तव्यमू" । सन्तों को विद्या पढ़ने से क्या
काम ? क्योंकि विद्या पढ़नेवाले भी मर जाते हैं फिर दन्त-कटाकट क्यों करना ? साधुओं
को चार धाम फिर आना, सन्तों की सेवा करनी, रामजी का भजन करना।
जो किसी ने मूर्ख, विद्या की मूर्ति न देखी हो तो खाखीजी का दर्शन कर आवें ।
उनके पास जो कोई जाता है उनको बच्चे बच्चे कहते हैं चाहे वे खाखीजी के बाप मा के
समान क्यों न हो ! जैसे खाखीजी हैं वैसे ही रूखड़" सुखड़", गोदड़िये और जमात वाले
मृत रेसाई और अकाली', कनफटे', जोगी, औघड़' आदि सब एक से हैं। एक खाखी
का चेला “श्री गणेशाय नम:* घोखता घोखता कुवे पर जल भरने को गया। वहां पण्डित

ही (विवेकी)' ऐसा बन्दिनी युक्त पाठ अपेक्षित है । 4 ये सब वेषधारी साधुओं के भेद है।

News Updates

Here you find some awesome old untold Stories about sports Featured on annews24.com. So Stay tune with us.

No comments:

Post a Comment