परमात्मा का ऊंचा(prmatma ka uncha ), part22

कोई वैकुण्ठ में जाकर विष्णु के पग का चिह्न ललाट में करा आया है ? और श्री जर
वा चेतन ? (वैष्णव) चेतन है । (विवेकी) तो यह रेखा जड़ होने से श्री नहीं है। हम
हैं कि श्री बनाई है वा विना बनाई ? जो विना बनाई है तो यह श्री नहीं, क्योंकिं
इसको तो तुम नित्य अपने हाथ से बनाते हो; फिर श्री नहीं हो सकती। जो तुम्हारे ललारे
में फ्री हो तो कितने ही वैष्णव का बुरा मुख अर्थात् शोभारहित क्यों दीखता है ? ललाट
में श्री आर घर घर भीख मांगते और सदावर्त लेकर पेट भरते क्यों फिरते हो ? यह जा
साड़ी शराब निर्लजता की है कि कपाल में श्री और महादरिद्रों के काम हो।
इनमें एक 'परिकाल'* नामक वैष्णव भक्त था। वह चोरी डाका मार छल कपट
कर पराया धन हर वैष्णवों के पास धर प्रसन्न होता था। एक समय उसको चोरी में पदार्थ
कोई नहीं मिला कि जिसको टूटे। व्याकुल होकर फिरता था । नारायण ने समझा कि
हमारा भक्त दु:ख पाता है। सेठजी का स्वरूप धर अंगूठी आदि आभूषण पहन रथ में
बैठ के सामने आये । तो तब परिकाल रथ के पास गया । सेठ से कहा सब वस्तु शीघ्र
उतार दो नहीं तो मार डालूंगा। उतारते उतारते अंगूठी उतारने में देर लगी। परिकाल
ने नारायण की अंगुली काट अंगूठी ले ली। नारायण बड़े प्रसन्न हो चतुर्भुज शरीर वना
दर्शन दिया। कहा, कि तू मेरा वड़ा प्रिय भक्त है, क्योंकि सब धन मार लूट चोरी कर
| वैष्णवों की सेवा करता है, इसलिये तु धन्य है। फिर उसने जाकर वैष्णवों के पास सब
गहने धर दिये। एक समय परिकाल को कोई साहूकार नौकर कर जहाज में बिठा
देशान्तर में लेगया, वहां से जहाज में सुपारी भरी। परिकाल ने एक सुपारी तोड़ आधा
टुकड़ा कर वनिये से कहा यह मेरी राधा सुपारी जहाज में घरदो और लिखदो कि
जहाज में आधी सुपारी परिकाल की है। बनिये ने कहा कि चाहे तुम हजार सुपारी ले
लेना। परिकाल ने कहा नहीं हम अधर्मी नहीं हैं जो झूठ मूठ लें। हम को तो आधी
चाहिये। वनिये ने, जो विचारा भोला भाला था, लिख दिया। जब अपने देश में बन्दर
पर जहाज आया और मुपारी उतारने की तैयारी हुई, तब परिकाल ने कहा हमारी आधी
सुपारी दे दो। बनियां वही आधी सुपारी देने लगा। तव परिकाल झगड़ने लगा ‘मेरी तो
जहाज में श्राद्ध सुपारी है, आधा बांट लेंगे । राजपुरुपों तक झगड़ा गया। परिकाल ने
चने का लेख दिखलाया कि इस ने राधा सुपारी देनी लिखी है । बनियां बहुतसा कहता
हा परन्तु उसने न माना, आधी सुपारी लेकर वैष्णवों के अर्पण करदी। तब तो वैष्णव
बड़े प्रसन्न हुए । तो उस डाकू चोर परिकाल की मूर्ति मन्दिरों में रखते हैं। यह कया
भक्तमाल में लिखी है। बुद्धिमान् देख लें कि वैष्णव, उनके सेवक और नारायण तीना
सरम एडली हैं वा नहीं ? यद्यपि मतमतान्तरों में कोई थोड़ा अच्छा भी होता है तथापि
स मत में रह कर सर्वथा अच्छा नहीं हो सकता। अब जैसा वैष्णवों में फुट टूट

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