परमात्मा का ऊंचा(prmatma ka uncha ), part21

कोई मनुष्य वेद और वेदानुकूल आप्त ग्रंथों का अपमान करे उसको श्रेष्ठ लोग जातिवाह्य
करदें, क्योंकि जो वेद की निन्दा करता है वही नास्तिक कहता है ॥८॥ इसलिये वेद,
स्मृति, सत्पुरुषों का आचार और अपने आत्मा के ज्ञान से अविस्द प्रियाचरण ये चार धर्म
के लक्षण अर्थात् इन्हीं से धर्म लक्ष्य होता है ।९॥ परन्तु जो द्रव्यों के लोभ और काम
अर्थात् विषयसेवा में फंसा हुआ नहीं होता उसी को धर्म का ज्ञान होता है। जो धर्म को
जानने की इच्छा कर उनके लिये वेद ही परम प्रमाण है ॥१०॥ इसी से सब मनुष्यों को
उचित है कि वेदोक्त पुण्य रूप कर्मों से ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य अपने सन्तानों का निपेकादि
संस्कार करें जो इस जन्म वा परजन्म में पवित्र करने वाला है ॥११॥ ब्राह्मण के सोलहवं.
क्षत्रिय के बाईसवें और वैश्य के चौबीसवें वर्ष में केशान्त कर्म और चोरमुण्डन हो जाना
चाहिये, अर्थात् इस विधि के पश्चात् केवल शिखा को रख के अन्य डाढ़ी मूछ और शिर
के बाल सदा मु उवाते रहना चाहिये, अर्थात् पुनः कभी न रखना और जो शीतप्रधान देश
हो तो कामगार है चाहे जितने केश रक्खें और जो अति उष्ण देश हो तो सव शिखा
सहित छेदन करा देना चाहिये, क्योंकि सिर में बाल रहने से उष्णता अधिक होती है और
न उससे बुद्धि कम हो जाती है, दाढ़ी मूछ रखने से भोजन पान अच्छे प्रकार नहीं होता और
र निक
ही उच्छिष्ट भी बालों में रह जाता है ॥१२॥
इन्द्रियाणां पिचर्तां विषयेष्वपहारिपु । संयमे पर्ननातिष्टेडियात् पन्तेव वादिनान् ॥१॥ (मनः २==)।
है
पृन्द्रिपाखा प्रसन्न न दोपमुच्हत्यसंशषम् सपियम्य तु तान्येव ततः निधि नियच्छति ।२॥ (अनु० २ह ३) ।
न जातु कामः कामानामुषभोगेन शाम्पति । हरिपा चमेव
भूय एव भवतः ॥३।। (मनु. २४)।
देदास्त्यागर्च यड्ञास्च नियमारच तपासि च। न चित्रदुष्टनावस्थ सिद्धि गच्छन्ति कची ।।४।। (मनु० २ ६७) ।
सक। क्ग़ कृत्येन्द्रिपश्राम संपम्य च मनस्तथा सर्वान् संसाधवेदर्धानदियकन् पोगतस्तनुम्र ॥३॥ (अनु० २१००) ।
संक। एवा एवा च दृष्ट्वा ना भुक्त्वा यात्वा च थो नर:ा न हृष्पति म्तायति वा स किझेपो जितेन्द्रिय: ६u(मनु० २हe)।
नाशष्ट: कस्पचित् जुपाश्र चान्यायेन एच्दत: । जानशचि हि मेधावी जडवद्रो चरेत् ।।७।। (मनु० २।११०) ।।
विर्ण कपर्वप: कर्म विद्या भवति पञ्चमी । एतानि मान्यस्थानानि गरीपों यद्दुतरम् ॥८॥ (मनु० २१३६) ।
अड़ो मवति वै वाल: फिता भवति मन्दः । अतं हि बालमित्याहुः पितत्येव तु मन्त्रदम् ।ह (मनु० २श१्५३) ।
न हाथ नैनन पलितैर्न विलेन न बन्धुमि: शपपश्रक्रे धर्म योऽनूचानः: स नो महान् ।१० (मनु० २१५४)।
विप्राणां जानता ज्याचे क्षत्रियाणां तु वीर्यत: पैश्यानां धान्यघनत: शुद्राणामेव जन्मत: ॥११। (मनु० २१५३)
न तेन वृद्ो भवति पेनास्प पतिर्ं शिर: 1 यो च युवाप्यरधीवानस्तं देवा स्थचिरं विदु: १२। (मनु० २१५६) ।
यथा काष्टमणो हस्ती पचा र्ममयो मुगः । यश्च किश्रोऽनधीपानस्त्रपस्ते नाम दिअ्रति 1१३ा (मनु० ॥१५७) ।।
अहिंसा व मूताना कार्य श्रेयोऽनुशासनम् । वाक्चप मधुरा लक्ष्मण अयोध्या धर्ममिच्छता ।।१५।। (मन २॥१५६) ।
मनुष्य का यही मुख्य आचार है कि जो इन्द्रियां चित्त को हरण करने वाले विषयों में प्रवृ
कराती हैं उनको रोकने में प्रयत्न करे, जैसे घोड़े को सारथी रोक कर शुद्ध मार्ग में चलाता
इस प्रकार इनको अपने वश में करके अधर्ममार्ग से हटा के धर्ममार्ग में सदा चलाया करे॥१
क्योंकि इन्द्रियों को विषयासक्ति और अधर्म में चलाने से मनुष्य निश्चित दोष को प्राप

कमूच्डो जटिल: शिसी (लौगायिगृह० १२) अर्थात् चाहे मू ढ मुडाये, वा जटा रखे अषवा शिखा रखे मुण्डा: शिसारहिता: ( तौगाशित्
vn) शर्षात मुण्ड का अर्थ है शीशा रहित ।। मनु (२॥२१) में भी कहा है-मुण्डो वा जटिलो वा स्यादयवा स्याच्िदखाजट: । अर्थात् िखार
हो, गा जटाधारी हो अथवा शिखा रखें ।

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