परमात्मा का ऊंचा(prmatma ka uncha ), part20

दशम समुल्लास:
ISI(माऽपश्य विषयान् व्याख्यास्यामः

। । । । । तर, मशीलता, सपा का संग और सद्विद्या के
।। ।। ।। 'द धार और इनसे विपरीत अनाचार कहता है उसको लिखते हैं
ii। [1] ॥1 ॥४॥11॥।। (1 1) ॥ ५॥भित ।।१।। (मनु० ॥१) ।।
।।।।। । । । । । । frrrrr: म रण दि ॥२॥ (मन २)।
१५। ५ । ।। ।।।। जागरण में ग ताः गुणाः ।।३।। (मनु० ॥३) ।।
।।।।|| नि (१५१ ह (गन । '६ 11 चित् गगरका मग भाषितम् ।।४।। (मनु० २४४) ।
१।। ५।। ७ । । । भारत सना रमन तुष्टि। १।।५।। (मनु० २६)।
॥ ॥॥ ॥ ॥ । unurमाणपती विद्वान् गर्न मिति ।।।६।। (मनु० श८)।
। ५।।। ५ ।।१।।। {मान र भानु गुम ।।७।। (मनु श)।
।५।।।।। ।। ।।।।।। ।। ।।1रिका नास्तिको वेदनिन्दकः ।। ।। (मनु २।११) ।
५५।।।।।।।।।।।।।। ।।।।।।।।। fiu । गागाड नरागम् ।।६।। (मनु० २।१२) ।।
।।।।।।। ।।। ।।।।। । । शिगगाना गा र धो: ।।१०।। (मनु० २१२) ।
।। sifal 104199ufe( 3मनाए । कार्य। शरीस्कार; पाचन प्रेरण पेह च ॥११॥ (मनु० ॥२६)। .
।।।। । ५५५५ ५। न्यजन्द विश 1 पण के तत: १२ (मनु० श६्श)।

मनुष्य को मदा इस बात पर ध्यान रखना चाहिये कि जिसका सेवन रागद्वेषरहित
विद्वान् लोग नित्य करें, जिसको हृदय अर्थात आत्मा से सत्य कर्तव्य जानें वही धर्म मान
नीय और करणीय हैं ।१। क्योंकि इस संसार में अत्यन्त कामात्मता और निष्कामता
श्रेष्ठ नहीं है, वेदार्थ ज्ञान और वेदोक्त कर्म ये सब कामना ही से सिद्ध होते हैं ॥२॥ जो
कोई कहे कि मैं निरिच्छ और निष्काम हैं वा हो जाऊँ तो वह कभी नहीं हो सकता, क्यों
कि सब काम अर्थात यज्ञ सती भाषण आदि व्रत, यम नियम रूपी धर्म आदि संकल्प ही से
सुनते हैं ।m२ क्योंकि जो जो हस्त, पाद, नेत्र, मन आदि चलाये जाते हैं वे सब कामना
ही से चलते हैं, जो इच्छा न हो तो आंख का खोलना और मीचना भी नहीं हो सकता ॥४॥
इसलिये सम्पूर्ण वेद मनुस्मृति तथा ऋषिप्रणीत शास्त्र, सत्पुरुषों का आचार और जिस
जिस कर्म में अपना आत्मा प्रसन्न रहे अर्थात् भय शङ्का लज्जा जिनमें न हो उन कर्मों
| का सेवन करना उचित है । देखो ! जब कोई मिथ्याभाषण, चोरी आदि की इच्छा करता
है तभी उसके आत्मा में भय, शा, लज्जा अवश्य उत्पन्न होती है, इसलिये वह कर्म करने
योग्य नहीं ॥५।। मनुष्य सम्पूर्ण शस्त्र, वेद, सत्पुरुषों का आचार, अपने आत्मा के अविरुद्ध
अच्छे प्रकार विचार कर ज्ञाननेत्र करके श्रुति प्रमाण से स्वात्मानुकूल धर्म में प्रवेश करे ॥६॥
क्योंकि जो मनुष्य वेदोक्तधर्म और जो वेद से अविरुद्ध स्मृत्युक्त धर्म का अनुष्ठान करता
है वह इस लोक में कीर्ति और मर के सर्वोत्तम सुख को प्राप्त होता है ॥७॥ श्रुति वेद और
स्मृति धर्मशास्त्र को कहते हैं इनसे सब कर्तव्य कर्तव्य का निश्चय करना चाहिये,

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