परमात्मा का ऊंचा(prmatma ka uncha )part2

इसी प्रकार एक नदी ऐसी है जिसका सम्बन्ध प्राणी-मंडल से है।
एक और नाड़ी ऐसी है जिसका सम्बन्ध ध्रुव-मण्डल से है ।

जब इस नाड़ी के द्वारा १-सूर्य, २-आरुणि तथा ३-ध्रुव, इन तीमो
नाड़ियों का चक्र चलता है तो मानो ये यज्ञ-वेदी में तीन समिधाएं हैं।
याज्ञिक पुरुष की ये तीन समिधाएं जागरूक हो जाती है तो १-सूयं-मण्डल,
२-प्रारुणी-मण्डल और ३-ध्रुव-मण्डल का रहन-सहन तथा वहां का विचा
वह योगी स्वयं करने लगता है।

१-अब प्रश्न है कि तीनों लोकों को जानने के लिए हम अग्नि की
आहुति किस प्रकार दे सकते ?

इसका उत्तर यह है कि हे याज्ञिक पुरुष ! यदि तु यज्ञ का अधिकारी
बनना चाहता है, यज्ञ के द्वारा दूसरे लोको में रमण करना चाहता है, नाना
प्रकार के भौतिक परमाणग्रों को जानना चाहता है तो तुझे मन और प्राण
दोनों को सम्बन्धित करके, इनका मन्थन करके दोनों के सूक्ष्म रूप जिसको
महतत्व कहा जाता है तथा उसे प्रकृति का वहुत ही सुक्ष्म रूप कहा जाता
है उसकी आहुति देनी होगी, इसी आहुति से मानव भारद्वाज, भगु, व्यास,
सुखदेव जैसा बन सकता है।

२-उपर्यक्त तीन समिधाओं के अतिरिक्त उनके साथ तीन समिधाए
और होती हैं । १-पृथ्वी-मण्डल की २-एक अन्तरिक्ष-मण्डल की तथा
३-एक दु-मण्डल की । इनको क्रमशः १-स्वान, २-अनुतनी अौर ३-कृति
कहते हैं। ब्रह्मरन्ध्र में इनकी जागरूकता होने पर वह याज्ञिक तीनों लोको
की वार्ता जानने वाला हो जाता है। यह आध्यात्मिक-बेतात्रों का कथन ।
है।

३-ब्रह्मरन्ध्र में चार नदियां और होती हैं जिनको १-स्वाति
| २-अमेलनी, ३-क्रातनी तथा ४-रेन केतु कहते हैं। इनको जानकर तथा इनका
मिलान करके अर्थात् चार आहुति बनाकर देने से एक अप्रेत को प्राप्त ही
जाती है।

इस प्रकार इन दसों समिधा (१-सूर्य-मण्डल, २-रुणी-म"
३-ध्रुव-मण्डल, ४-पृथ्वी-मण्डल, ५-अन्तरिक्ष-मण्डल, ६-द्य-मण्डल, ७
5=प्रमेलनी, ९-ऋ्रतनी और १०-रेनकेतु) का मिलान होकर चार समय्
उनके ऊपर छा जाती हैं। इसके पश्चात् हृदय रूपी वेदी में इन
हो पाहते लगाकः
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लगाकर जो अग्नि उत्पन्न होती है,, इससे एक महान गति
हो जाती है। उसमें जो हत्या का जन्म होता है तो उसमें संसार
क लोकान्तर समा जाते हैं। उस समय प्रकृति रूपी पार्वती ब्रह्म
शिव की भाभी का हृदय रूपी यज्ञ-वेदी में जब नृत्य होने लगता है
या अग्नि प्रदीप्त होकर मन और प्राण की सूक्ष्म धृत रूपी ब्राहृति उसमें
है तो उस समय योगी का हृदय सब लोक-लोकान्तरों को जानने
जन जाता है। वह पुरुष ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करते हुए इस संसार
कप्रिय हो जाता है, यु-लोक में लोकप्रिय हो जाता है। द्य-लोक में
ॐ महा विशेष आत्मा भ्रमण करती हैं, उनमें भी ऊंची स्वर्ग की
आत्मा को वह आत्मा प्राप्त हो जाता है ।

(पन्द्रहवां पुष्प १३-७-७१ ई०)

यज्ञ-पद्धति की व्यवस्था :
जब यज्ञ करने वाले होते हैं, तो तपस्वी ब्राह्मण भी आ ही जाते हैं
क्योंकि इस पृथ्वी से उनका वोट नष्ट नहीं हुआ है। किन्तु राष्ट्र
यज्ञ-कर्म करने वालों की सूक्ष्मता हो गई है।

(नौवां पुष्प २८-७-६७ ई०)
एक ऐसा समाज मनुष्यों का होना चाहिए, जो यज्ञ पर अनुसन्धान
रे तथा इसको रूढ़िवाद में न होने दे । अनुसन्धान करके वह संसार को
यह संदेश दे सके कि जितने दूषित परमाणु उसने एकत्रित कर लिए हैं,
लंका विनाश केवल यज्ञ की सुगन्धि के द्वारा ही किया जा सकता है ।

वह समय निकट है, जब सर्व-विज्ञान इस यज्ञवेदी के नीचे आने
ता है । आज का संसार इस वात से चितित है कि इस परमाणुवाद को,
किया जा रहा है, उसका क्या बनेगा ? इससे जी अग्नि उत्पन्न होगी
"भव कुछ नष्ट कर देते । तब इसको निगलने के लिए किसी उपाय को
कालना चाहिए ।

उस समय वैज्ञानिक कहता है कि गो-घृत में कोई तत्त्व ऐसा है

Fa को नहीं खोज सका । इस विधि को प्राप्त करने के लिए, उसे
अ पले परमाणुवाद को निगलने की शक्ति है । किन्तु वह अभी
'म पर गाकर उसे समाज से यह जानना होगा, जिसने इस
पंधान किया होगा ।
(सोलहवाँ पुष्प १६-१०-७१

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