परमात्मा का ऊंचा(prmatma ka uncha ), part19

पथ द्वि वि बदतः पेशो नाभिशते । सम्मान देना मेष सोन्या पुणं विदुः ।। १५ । (मनु० दrd) ।
इसेत्रस्थीत्पार्यान पच्च कन्पाय बन्यसे । विश्य् न्थितस्ते हपेपः धुच्पपायेचिता दनिा ॥ १४॥ (मनु० ८६.१) ।
सब वणो में धार्मिक, विद्वान, निष्कपटी, सब प्रकार धर्म को जाननेवाले, लोभरहित
सत्यवादी को न्यायज्यवस्था में साची करे, इससे िपरीतों को कभी न कर ।9। स्त्रियों की
। साक्षी स्त्री, द्विजों के द्विज, शूद्र के शुद्र और अन्त्यजों के अन्त्यज साक्षी हो ॥२॥ जितने
बलात्कार काम चोरी, व्यभिचार, कठोर वचन, दण्डनिपात रूप अपराध हैं उनमें साक्षी
* की परीक्षा न करे अर अत्यावश्यक भी समझे, क्योंकि ये काम सब गुप्त होते हैं ॥ ३
दोनों ओर के साथियों में से बहु पक्षानुसार, तुल्य सूचियों में उत्तम गुणी पुरुष की साक्षी
के अनुकूल, और दोनों के साक्षी उत्तम गुणी और तुल्य हों तो द्विजोत्तम अर्थात् ऋषि
महर्षि और यतियों की साक्षी के अनुसार न्याय करे ॥४॥ दो प्रकार के साक्षी होना सिद्ध
होता है एक साचा देखने और दूसरा मुनने से, जब सभा में पूछे तब जो साक्षी सत्य बोले
दे धर्महीन और दण्ड के योग्य न होवें और जो साक्षी मिथ्या बोलें वे यथायोग्य दण्ड
नीय हों ॥५॥ जो राज्यसभा व किसी उत्तम पुरुषों की सभा में साक्षी देखने और सुनने से
| विरुद्ध बोले तो वह (अवाड नरक) अर्थात् जिहा के छेदन से दुःखरूप नरक को वर्तमान समय
में प्राप्त होवे और मरे पश्चात् मुख से हीन हो जाय ॥६॥ साक्षी के उस वचन को मानना
कि जो स्वभाव ही से व्यवहार सम्बन्धी बोले, और इससे भिन्न सिखाये हुये जो जो वचन
बोले उस उस को न्यायाधीश व्यर्थ समय ।७ जब अर्थी (वादी) और प्रत्यर्थी ( प्रति
वादी) के सामने सभा के समीप प्राप्त हुए पक्षियों को शान्तिपूर्वक न्यायाधीश और प्राङ
विवेक अर्थात वकील वा बैरिस्टर इस प्रकार से पूछे ॥८॥ हे साक्षि लोगो ! इस कार्य में इन
दोनों के परस्पर कामों में जो तुम जानते हो उसको सत्य के साथ वोलो, क्योंकि तुम्हारी
इस कार्य में साक्षी है ॥६॥ जो साक्षी सत्य बोलता है वह जन्मान्तर में उत्तम जन्म र
उत्तम लोकान्तरों में जन्म को प्राप्त होके सुख भोगता है, इस जन्म वा परजन्म में उत्तम
कीनिं को प्राप्त होता है, क्योंकि जो यह वाणी है वही वेदों में सत्कार और तिरस्कार का
कारण लिखी है। जो सत्य बोलता है वह प्रतिष्ठित और मिथ्यावादी निन्दित होता हैं ॥१०॥
सत्य बोलने से साक्षी पवित्र होता और सत्य ही बोलने से धर्म बढ़ता है इससे सब चणों में
साथियों को सत्य ही बोलना योग्य है ॥ ११॥ आत्मा का साक्षी आत्मा और आत्मा की
गति आत्मा है इसको जान के है पुरुष ! तू सब मनुष्यों का उत्तम साक्षी अपने आत्मा का
अपमान मत कर, अर्थात् सत्य भाषण जोकि तेरे आत्मा मन वाणी में है वह सत्य और जो
इससे विपरीत है वह मिथ्याभाषण है ॥ १२ ॥ जिस बोलते हुए पुरुष का विद्वान् क्षेत्रज्ञ
अयति शरीर का जाननेहारा आत्मा भीतर शङ्का को प्राप्त नहीं होता उससे भिन्न विद्वान् ।
नोग किसी को उत्तम पुरुष नहीं जानते ॥१३॥ है कल्याण की इच्छा करनेहारे पुरुष !

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