परमात्मा का ऊंचा(prmatma ka uncha ), part18

होकर धर्म उपस्थित होता है, जो उसका शल्य अर्थात तीव्रता धर्म के कलतंक, कानकदू
और अधर्म का छेदन नहीं करते अर्थात् धर्मी को मान अधर्मी को दएड तहीं मतत सत
सभा में कितने समास है के सब घायल के समान समभे जाते हैंu७॥ धामिक्
किया करे अर्थात किसी का पक्षपात कभी न करे ॥६॥ जिस सभा में अन्न
को योग्य है कि सभा में कभी प्रवेश न करें, और जा प्रवेश किया हो तो म
जो कोई सभा में अन्याय होते हुए को देखकर मौन रहे अथवा सत्य न्याय के
न्याय के विरुद्ध
वह महापापी होता है ॥८॥ जिस सभा में अधर्म से घमे, असत्य से सत्य मदद
देखते हुए मारा जाता है उस सभा में सब मृतक के समान हैं जानो उनमें से
जीता ॥९॥ मरा हुआ धर्म मारने वाले का नाश कर रकित किया हुआ धर्म
रना करता है, इसलिये धर्मे का हनन कभी न करना इएस डर से कि मारा हुआ घस *
हम को न मार डाले ॥१०॥ जो सव ऐश्वर्या के देने और सुखों की वर्षा करने के
है उसका लोप करता है उसी को विद्वान् लोग वृषल अर्थात् शूद्र और नीच ,
इसलिये किसी मनुष्य को धर्म का लोप करना उचित नहीं ॥११॥ इस संसार में
ही मुहृद् है जो मृत्यु के पश्चात् भी साथ चलता है और सब पदार्थ वा संगी शरीर हेत
के साथ ही नाश को प्राप्त होते हैं, अर्थात् सब का संग छूट जाता है परन्तु धर्म का
से
कभी नहीं छूटता ॥9२॥ जब राजसभा में पच्पात श्रन्याय किया जाता है कहां ई
के चार विभाग हो जाते हैं उनमें से एक अधर्म के कर्ता, दूसरा साक्षी, तीसरा सभा
और चौथा पाद अधर्मी सभा के सभापति राजा को प्राप्त होता है ॥१३॥ जिस सभा
निन्दा के योग्य की निंदा, स्तुति के योग्य की स्तुति, दण्ड के योग्य को दण्ड ।
मान्य के योग्य का मान्य होता है वहां राजा और सब सभासद् पाप से रहित औरऍ
हो जाते हैं, पाप के कता ही को पाप प्राप्त होता है ॥१४॥
साक्षी कैसे हों अब साची केसे करने चाहियें :

आप्ताः सर्वेषु चणेषु काप्पः कार्येषु सारिणः । सर्वधर्मविदोऽनुषा विपरीत अस्ति वर्जयेत् ।।१।। (मनु० =६३।
इश्रीशां साचर्ष स्त्रिप: कुयेदजानां सहशा हिेजा: । शक्रार्च सन्त: शुद्राणामन्त्यानामन्त्ययोनय: 11२॥ (मउु०=1*
साहसेषु च सर्वेषु स्तेयसड्परणेपु च। वाग्दणटयोर्च पारुप्ये न परीचेत साविशः शI (मनु°६9्त
बहुत्वं परिगृहीयाल्साचिद्रेचे
नराधिपः । समेषु तु गुणोत्कृष्टान् गुणधे द्विजोत्तमान् ।।४।। (अनु० =
साधी एएकुतादन्पद्िजु बन्नाय्र्यसंसदि 1 अवाह्नरकमम्येति प्रेत्य स्वर्गाच्च हीयते ।।६॥ (मनु
समचदर्शनात्साखर्य शवणाच्कैव सिन्यति । तत्र सत्यं त्रचन्साची घर्मार्थाम्यां न हीयते ।।५।। (मनु ।
भावेनैव पद्म पुस्ता आम व्यावहारिकं । अतो
प्राप्तानयिप्र्य्थिसकिधी । प्राइबिवाकोऽनपुष्जीत विधिनाऽनेन सान्त्वदयन् ॥८॥ (मन० ८w९/
पदन्पद्रि्र ुर्घमार्थ
समान्त:साखी:
तदपार्थकम् II (मनु० ८४य
पदू इयोरनयोर्वेर्थ कार्येस्मिन् चेहिर्त मिष: । तद् जुरन सर्व सत्येन युष्माक झत्र साचितवा ।९॥ (मनु० ८5"
सत्यं साचपे जुबन्साघी खोकानाप्नोति पुष्मलान् । इइ चानुचमां कीचिति बागेषा श्रङ्पूंजिता ॥१०॥ (मनु० 6=0/
सत्येन पूशते साघो धर्म: सत्थेन कढ़ते । तस्मात्सत्यं हि वक्तव्यं सर्ववर माणिभिः ॥११॥ (२)
आत्मैव इात्मन: साषी गतिरात्मा तथात्मन: । मावमंस्था: स्वमास्यान नतखां साधिखहचमम् ॥१२॥

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