परमात्मा का ऊंचा(prmatma ka uncha ), part17

राजकीय निज काम अर्थात जिस को 'पोलिटिकल कहते हैं संक्षेप से कह दिया, अब जो
विशेष देखना चाहे वह चारों वेद मनुस्मृति शुक्रनीति महाभारत आदि में देखकर निश्चय
कने, और जो प्रजा का न्याय करना है वह व्यवहार मनुस्मृति के अष्टम और नवमाध्याय
आदि की रीति से करना चाहिये, परन्तु यहाँ भी संक्षेप से लिखते हैं:-

स्टाइल विवाद मार्ग ।
और उनका न्याय

। प्रत्यहं देशरएंघ शावरच हेतुभिः । अष्टादशसु मार्गेषु निबद्धानि पृह पृथक् ॥१॥ (मनु० ८३) ।
तेपामायमूणादानन निषेषोऽस्वामिविक्रप: संभूष थ समुत्थान दचस्यानपकर्म च ।२। (मनु० EI४) ।
वेतनस्पैद चादान संविदध ध्यतािकम: 1 कयचिक्रयानुशयोचिवाद: स्वामिपालयो: ३I (मनु० ८५) ।।
सीमाविवादघर्मध पारुम्ये दणडवाधिके । स्तेपं च साहस चैव स्त्रीसदप्रहणमेष प ।911 (मनु० ८६) ।
स्रीपघ्मों विभागस्ष पृतमादप एव च

पदान्यप्टादर्शशान्नि व्यवहारस्थिताचिद ।५। (मनु० ८ा७)।
एप स्थानेषु भूषिष्ठ विवाद चरतां नृखाम । धर्म शारतमाधिस्य पात्कार्यविनिर्णयम् ॥६॥ (मनु० Ele) ।
बम विस्वधर्मेण सभा पोषतिष्ठते । शन्यं चास्य न कुन्तन्ति विद्धास्तत्र समासद:।७। (मनु० El१२)।
समा चा न प्रवेट्यं ककव्र्य बासमंजसम् । फनु वन्वित्र बन्बापि नरी भवति किन्विपी ॥८॥ (मनु० =|१३)।
पत्र धर्मों प्धमेश सत्पं पत्ानृतेन च। हन्पते प्रेचणाणाना इतास्तत्र समासद: I६। (मनु० ८।१४) ।
गम एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः । चश्मा मों न हन्तच्यो मा नो धर्मो हतोऽधीत् ।।१०।। (मनु० El१५)।
इपो हि मगवान् घर्मस्तस्य कृछ्ते दलम । एृपल तं विदुद्देवास्तस्मादर्ग न लोपयेत्॥११॥ (मनु० c१३) ।
एक एव सहदरमों निघनेऽप्पनुषाति प: शरीरेण समन्नाशं सर्वमन्यद्धि गच्डति ॥१२॥ (मनु० cर७) ।
यादो धर्मस्य फर पादः साक्षिणमृति । पादः समासदः सर्वान् यादो राजानमृच्छति ।।१३।। (मनु० E|१८) ।
राजा भवत्पनेनास्तु पन्त च समासद: । एनो गच्छति कर निन्दादों यत्र निन्दते ।१२ (मनु० =१९)।

सभा राजा और रामपुर सवलत देशाचार और शास्त्र व्यवहार हेतुओं से निम्नलिखित
अठारह विवादास्पद मांगों में विवादयुक्त कर्मों का निर्णय प्रतिदिन किया करें और जो जो
नियम शास्त्रोक्त न पावें और उनके होने की आवश्यकता जाने तो उत्तमोत्तम नियम
बांधे कि जिस से राजा और प्रजा की उन्नति हो ॥१॥ अठारह मार्ग यह हैं, उन में से
१-(ऋणादान ) किसी से ऋण लेने देने का विवाद । २-(निक्षेप) धरावट अर्थात् किसी
ने किसी के पास पदार्थ धरा हो और मांगे पर न देना। ३-( अस्वामिविक्रय) दूसरे के
पदार्थ का दूसरा बेच लेवे । ४-( संभूय च समुत्थान ) मिल मिला के किसी पर अत्या
चार करना। ५-( दत्तस्यानपकर्म च ) दिये हुए पदार्थ का न देना ॥२॥ ६-(वेतनस्यैव
चादान ) वेतन अर्थात किसी की "नौकरी* में से ले लेना वा कम देना अथवा न देना।
-(संविद ०) प्रतिज्ञा से विरुद्ध वर्तमान। ८-( क्रयविक्रयानुशय ) अर्थात् लेन देन में
झगड़ा होना । ९=पशु के स्वामी और पालने वाले का भांगड़ा ।३॥ १०-सीमा का विवाद।
१-किसी को कठोर दण्ड देना। १२ कठोर वाणी का बोलना । १३-चोरी डाका मारना।
-किसी काम को बलात्कार से करना। १५-किसी की स्त्री वा पुरुष का व्यभिचार
ना ॥४॥ १६ स्त्री और पुरुष के धर्म में व्यतिक्रम होना । १७–विभाग अर्थात् दायभाग
बाद उठना। १८ य त अर्थात् जड पदार्थ और समय अर्थात् चेतन को दाव में धर
जुआ खेलना। ये अठारह प्रकार के परस्पर विरुद्ध व्यवहार के स्थान हैं ॥५॥ इन
बहारों में बहुत से विवाद करने वाले पुरुष के न्याय को सनातन धर्म के आश्रय

News Updates

Here you find some awesome old untold Stories about sports Featured on annews24.com. So Stay tune with us.

No comments:

Post a Comment