परमात्मा का ऊंचा(prmatma ka uncha ), part16

इसी प्रकार पाणिनि महर्षि ने सहस्र श्लोकों के बीच में अखिल शब्द अर्थ और ॥
की विद्या प्रतिपादित करदी है। धातुपाठ के पश्चात् उणादिगण के पढ़ाने में सर्व सत्र
विषय अच्छे प्रकार पढ़ा के पुनः दूसरी बार शंका, समाधान, कात्तिक, कारिका, प
की घटना पूर्वक अष्टाध्यायी की द्वितीय अनुवृत्ति पढ़ाये । तदनन्तर महाभाष्य पढ़ाये।
जो बुद्धिमान् पुरुषार्थी, निष्कपटी, विद्या वृद्धि के चाहने वाले नित्य पढ़े पढ़ाये तो है
में अष्टाध्यायी और डेढ़ वर्ष में महाभाष्य पढ़ के तीन वर्ष में पूर्ण वैयाकरण होने
और लौकिक शब्दों का व्याकरण से बोध कर पुन: श्य शास्त्रों को शीघ्र सहज में
पढ़ा सकते हैं। किन्तु जैसा बड़ा परिश्रम व्याकरण में होता है वसा श्रम अन्य शास्त्र
करना नहीं पड़ता। और जितना बोध इनके पढ़ने से तीन वर्षों में होता है उतना व
कुग्रन्य अर्थात् सारस्वत, चन्द्रिका, कौमुदी, मनोरमादि के पढ़ने से पचास वर्षों में मी *
हो सकता। क्योंकि जो महाशय महर्षि लोगों ने सहजता से महान् विषय अपने ग्रन्यो ।
प्रकाशित किया है वैसा इन च्द्ाशय मनुष्यों के कल्पित ग्रन्थों में क्योंकर हो सकता है।
महर्षि लोगों का आशय जहां तक हो सके वहां तक, मुगम और जिसके ग्रहण में सम्त्ध
थोड़ा लगे इस प्रकार का होता है और च्ुद्राशय लोगों की मनसा ऐसी होती है कि उ
तक बने वहां तक कठिन रचना करनी जिसको बड़े परिश्रम से पढ़ के अल्प लाम ।
सकें, जैसे पहाड़ का खोदना कौड़ी का लाभ होना । और आर्ष ग्रन्थों का पढ़ना ऐसा है
कि जैसा एक गोता लगाना बहुमूल्य मोतियों का पाना। व्याकरण को पढ़ के यास्कमुनिकृत
निघण्टु और निरुक्त छः वा आठ महीने में सार्थक पढ़े और पढ़ावें । अन्य नास्तिक कृ
अमरकोषादि में अनेक वर्ष व्यर्थ न खोवे । तदनन्तर पिङ्गलाचार्यकृत छन्दोग्रन्य जि
वैदिक लौकिक छन्दों का परिज्ञान, नवीन रचना और श्लोक बनाने की रीति भी ययत्
सीखें । इस ग्रन्य और श्लोकों की रचना तथा प्रस्तार को चार महीने में सीख पढ़ प़
सकते हैं। और वृत्तरत्नाकर आदि अल्प बुद्धि प्रकल्पित ग्रंथों में अनेक वर्ष न सोरें त
श्वात मनुस्मृति, वाल्मीकि रामायण और महाभारत के उद्योग पर्वान्तर्गत विदुर नीति
आदि अच्छे अच्छे प्रकरण जिनसे दुष्ट व्यसन दूर हों और उत्तमता सभ्यता प्राप्त हो स
को काव्य रीति से अर्थ पदच्छेद, पदार्थोक्तिः, अन्वय, विशेष्य विशेषण और भावार्य के
अध्यापक लोग जनावें और विद्यार्थी लोग जानते जायें। इनको वर्ष के भीतर पढ़लें । तर
नन्तर पूर्वमीमांसा, वैशेषिक, न्याय, योग, सांख्य और वेदान्त, अर्थात् जहां तक बन स
वहां तक ऋषिकृत व्याख्यासहित अथवा उत्तम विद्वानों की सरल व्याख्यायुक्त छः शास्त्र
को पढ़े पढ़ाएं' । परन्तु वेदान्त सूत्रों के पढ़ने के पूर्व ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुए,

x राध्यामी में। हमारे यहां कन्द का परिणाम लिखने की एक रीति | उसे घरों आशा करते है।
मार एक सरस र म ।। गर्ग ने अपने से विचति । अत में लिखा है-'पाणपचितिविपि
१ मे गरिन । म आणि मग १।। अर्थात् नवाब

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