परमात्मा का ऊंचा(prmatma ka uncha ), part15

सत्यार्थ प्रकाश:
६३
तः परो यस्मात्स तपरस्तादपि परस्तपरः" तकार जिससे परे और जो तकार से भी परे हो
वह तपर कहता है, इससे क्या सिद्ध हुआ ओ आकार से परे 'त' और 'त' से परे ऐच' दोनों
तपर हैं, तपर का प्रयोजन यह है कि ह्रस्व और प्लुत की वृद्धि संज्ञा न हुई। उदाहरण
कभाग:" यहां "भज' धातु से "घज् " प्रत्यय के परे 'घ', 'ञ' की इसंज्ञा होकर लोप होगया,
पश्चात 'भज् अ" यहां जकार के पूर्व भकारोत्तर अकार को वृद्धिसंज्ञक आकार होगया है। तो
भाज अ’ पुनः ‘ज' को 'ग' हो अकार के साथ मिलके "भाग:'' ऐसा प्रयोग हुआ। “अध्यायः
यहां अधि पूर्वक “इङ' धातु के ह्रस्व 'इ' के स्थान में “घ” प्रत्यय के परे ऐ' वृद्धि और
उसको “आय” हो मिल के अध्याय: "नायकः"' यहां "नीज" धातु के दीर्घ ईकार के
स्थान में "ब्लू" प्रत्यय के परे 'ऐ* वृद्ध और उसको “आय” होकर मिल के “नायकः
और "स्तावक:* यहां "स्तु" धातु से 'एबुल् प्रत्यय होकर हस्व उकार के स्थान में र
वृद्धि, आव’ आदेश होकर अकार में मिल गया तो 'सेवक:, "कारक:* यहां “कृ”धातु
से आगे एबुल' प्रत्यय के 'ण' 'ल' की इत्संज्ञा होके लोप,वु के स्थान में अक’ आदेश और
ऋकार के स्थान में आर" वृद्धि होकर "कारक:* सिद्ध हुआ। जो जो सुत्र आगे पीछे के
प्रयोग में लगे उनका कार्य सब बतलाता जाय और स्लेट अथवा लकड़ी के पट्ट पर दिखला
दिखला के कच्चा रूप धर के जैसे भज+घञ+इस प्रकार धर के प्रथम घकार का फिर
ज' का लोप होकर भज्+अमु, ऐसा रहा फिर अ' को आकार वृद्धि और 'ज' के स्थान
में 'ग' होने से "भाग+अर+सूं * पुनः अकार में मिल जाने से 'भाग+सु*° रहा, अब उकार की
इत्संज्ञा ‘स' के स्थान में रु होकर पुनः उकार की इत्संज्ञा लोप हो जाने पश्चात् “भाग+र
ऐसा रहा, अब रेफ के स्थान में विसर्जनीय (:) होकर 'भाग:" यह रूप सिद्ध हुआ।
जिस जिस सुत्र से जो जो कार्य होता है, उस उस को पढ़ पढ़ा के और लिखवा कर कार्य
कराया जाए। इस प्रकार पढ़ने पढ़ाने से बहुत शीघ्र टृढ़ बोध होता है । एक बार इसी प्रकार
अष्टाध्यायी पढ़ा के धातुपाठ अर्थसहित और दश लकारों के रूप तथा प्रक्रिया सहित सूत्रों
के उत्सर्ग अर्थात् सामान्य सूत्र जैसे "कर्मणये" (३ RI9)कर्म उपपद लगा हो तो धातुमात्र
से"अणु" प्रत्यय हो,जैसे "कुम्भकार:" पश्चात् अपवाद सूत्र जैसे आतोऽनुपसर्गे क:* (३२ ३)
उपसर्ग भिन्न कर्म उपपद लगा हो तो आकारान्त धातु से*क* प्रत्यय होवे, अर्थात् जो बहुव्यापक
जैसे कि क्मोपद लगा हो तो सब धातुओं से "अण्° प्राप्त होता है उससे विशेष अर्थात् अल्प
विषय उसी पूर्व सूत्र के विषय में से आ कारान्त धातु को "क" प्रत्यय ने ग्रहण कर लिया।
जैसे उत्सर्ग के विषय में अपवाद सूत्र की प्रवृत्ति होती है वैसे अपवाद सूत्र के विषय में उत्सर्ग
सूत्र की प्रवृत्ति नहीं होती। जैसे चक्रवर्ती राजा के राज्य में माण्डलिक और भुमिवालों
की
प्रवृत्ति होती है वैसे माण्डलिक राजादि के राज्य में चक्रवर्ती की प्रवृत्ति नहीं होती।

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