परमात्मा का ऊंचा(prmatma ka uncha ), part14

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तृतीयसमुल्लासः

सदकारणवभित्पम् । वैशेषिक० १9। १ । १ ।
जो विद्यमान हो और जिस का कारण कोई भी न हो वह नित्य है, अर्थात् “सल
३ वध नित्यम्' जो कारण वाले कार्यरूप गण हैं, वे नृत्य कहाते हैं।
अरशद का अर्थ कारणं संयोगि बिरोधि सुपि चेति लिङ्गम् ।। पेशगिफ०६।२।१।।

इसका यह कार्य व कारण है इत्यादि समवायि, संयोगि, एकार्थसमवायि और वि त
यह चार प्रकार का लैङ्गिक अर्थात लिङ्गलिङ्गी के सम्बन्ध से ज्ञान होता हैं । “समा
जैसे आकाश परिमाण वाला है, संयोग" जसे शरीर त्वचा वाला है इत्यादि का नित्य सं पर
है, “एकार्थी समवायि” एक अर्थ में दो का रहना जैसे कार्य रूप स्पर्श कार्य का लिङ्ग अ "
जनाने वाला है, "विरोध” कैसे हुई वृष्टि होने वाली वृष्टि का विरोधी लिङ्ग है। व्याप्ति यः
नियतधर्यसाहित्यगुभयोरेकतरम्य वा प्याधि: ॥ निजशकतप, ज्रवगित्पाचार्पा: श्राषेषपशक्तियोग इति पत्चशिस्: ॥ सांग्य प् २६, ११,1भ
| जो दोनों साध्य साधन अर्थात सिद्ध करने योग्य और जिससे सिद्ध किया जाय ।
दोनों अथवा एक, साधनमात्र का निश्चित धर्म का सहचार है उसी को व्याप्ति कहते हैं,
धूम ओर श्रग्नि का समाचार है ॥२६॥ तथा व्याप्य जो धूम उसकी निज शक्ति से उत से
होता है, अर्थात् जब देशान्तर में दूर धूम जाता है तब विना अग्नियोग के भी धूम स्वयं क्र
रहता है। उसी का नाम व्याप्ति है, अर्थात् अग्नि के छेदन, भेदन, सामथ्र्य से जला प्रर
पदार्थ धूम रूप प्रकट होता है ॥३१॥ जैसे महत्तत्वादि में प्रकृत्यादि की व्यापकता बुद्धयादि दि
में व्याप्यता धर्म के सम्बन्ध का नाम व्याप्ति है । जैसे शक्ति श्राधेयरूप और शक्तिमान
आधार रूप का सम्बन्ध है ॥३२॥
इत्यादि शास्त्रों के प्रमाण आदि से परीक्षा करके पढ़े और पढ़ावें । अन्यथा विद्यार्थियों
को सत्य बोध कभी नहीं हो सकता। जिस जिस ग्रन्थ को पढ़ावें उस उस की पूर्वोक्त प्रकर
से परीक्षा करके जो सत्य ठहरे वह वह ग्रन्थ पढ़ावें, जो जो इन परीक्षाओं से विरुद्ध हों उन
उन ग्रन्थों को न पढ़े न पढावे, क्योंकि “लक्षण प्रमाण भ्यां वस्तु सिद्धिः लक्षण-जैसा कि “गन्धवत ।
पृथिवी'' जो पृथिवी है वह गन्धवाली है, ऐसे लक्षण और प्रत्यक्षादिप्रमाण इनसे सत्याउ्त्क
और पदार्थों का निर्णय हो जाता है, इसके बिना कुछ नहीं होता।
पण पठन। अब पढ़ने पढ़ाने का प्रकार लिखते हैं। प्रथम पाणिनिमुनिकृत शिक्षा जो
पाठन विधि। सूत्ररूप है उसकी रीति अर्थात इस अक्षर का यह स्थान यह प्रयत्न यह करष
हैं जैसे प' इसका ओष्ठ स्थान, स्पृष्ट प्रयत्न और प्राण तथा जीभ की क्रिया करनी करण
कहाता है। इसी प्रकार यथायोग्य सब चरों का उच्चारण माता पिता आचार्य सिखलावें। व
तदनन्तर व्याकरण अर्थात प्रथम अष्टाध्यायी के सूत्रों का पाठ जैसे "वृद्धिरादैच" (19।))
फिर पदच्छेद जैसे “वृद्धिः”, “आत्”, “एच” व “आदेश; फिर समास जैसे "आच ऐच श्दे। से
और अर्थ जैसे “आदेश वृद्धि संज्ञा क्रियते” अर्थात 'आ', 'ऐ’, ‘औ’ की वृद्धिसंज्ञा की जाती

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