परमात्मा का ऊंचा(prmatma ka uncha ), part13

गण करता है। जब हम इस माला को ग्रहण करते श्ै त हमारे हृदय
म एष उल्लास उत्पन्न होता है, प्रति एक ज्योति जागरूक होती है।
हमारा अन्तरात्मा यह उच्चारण करने लगता है कि हम परमपिता पर-
महात्मा का दर्शन करने के लिए उस ग्राभूषण को अपनाने का प्रयास करें,
जिसको अपनाकर हम प्रभु के द्वार पर जा सकते हैं।

(उनतीसवा पुष्प १९-३-७२ ई०)

हम अपनी मानवता को ऊंचा बनाने के लिए अपने जीवन में तपस्वी
ने और माला को धारण करें । ऋषि-मुनि माला को धारण करते हैं।
जैसे यह संसार की रचना है, यह नाना प्रकार की वनस्पतियां १-खनिज व
खाद्य पदार्थ है, इनकी जो प्रतिष्ठा है वह २-पृथ्वी मानी जाती है । पृथ्वी
* पतिष्ठा ३-जल, जल की प्रतिष्ठा ४-अग्नि, अग्नि की वायु, ५-वाय
की अन्तरिक्ष, ६-अन्तरिक्ष की प्रतिष्ठा यह तत्व है और यहां से ऋषि-
मुनियों का दूसरा अध्याय प्रारंभ होता है । देखो, नीचे से ऊच्बगति को
माला के मन के चले और नीचे को प्रारम्भ होते हैं। यह तत्वर से दूसरे
लोकों में जाना, १-सूर्य-मण्डलों को जानना, २-चन्द्र-लोकों को जानना,
३-गन्धर्व-लोकों, ४-इन्द्र-लोकों, ५-प्रजापति को जानना । प्रजापति ही यज्ञ
मय है । १-यज्ञ दक्षिणा में, २-दक्षिणा श्रद्धा में, ३-श्रद्धा मानव के हृदय
से उत्पन्न होती है। यह एक माला है जिसको ऋषि-मुनि धारण करते हैं।
इस माला को धारण करने वाला प्राध्यात्मिकवाद और भौतिकवाद दोनों
से उपराम हो जाता है।

हृदय से श्रद्धा, श्रद्धा से दक्षिणा, दक्षिणा से यज्ञ, यज्ञ से प्रजापति,
प्रजापति से इन्द्र, इन्द्र से गन्धर्व, गन्धर्व से चन्द्रमा, चन्द्रमा से सूर्य, सूर्य
महतत्व और महतत्व से अन्तरिक्ष, अन्तरिक्ष से वायु, वायु से अग्नि,
अग्नि से जल, जत स पृथ्वी, पृथ्वी से संसार की रचना होती है।
(सत्ताईसवां पुष्प ६-५-७६ ई०)

कविता और दैत्य
दैत्य गुरु ऋषि सृष्टि के प्रारम्भ से ही चले आते हैं। यदि ऐसा न
वा कर्म की क्रिया ही समाप्त हो जाती। दत्त ऋषियों के विपरीत
में किया करते थे -यदि ऋषि सत्य उच्चारण करते थे तो देत्य
जसे कर्म थे उसके अनुसार योनि तो प्राप्त होनी ही थी। परन्तु
पुष्ति के श्रारम्भ में वैस्य बहुत रूकप थे । गवि इसा शृष्टि में अिच्यावा
॥ १।। तो राग ।। । । । । गण नसा । भगा ।
।। गाय गौ ।। माता था। इस वादी ) गावड़ी

सृष्टि के प्रारंभ से ही हैं।
(पूरारा पुरय २१-०-१२ ई०)
देश तथा मनुष्य कहलाते हैं जो दूसरे जीवों को भधाण कर जाते है ।1
देवता के होते हैं जो तारों की रक्षा करते हैं । दिवता जब रंगामवादी वन
जाते हैं तो उनकी विजय हो जाती है और देखना समाप्त हो जाते है।

(चौथा पुष्प १८-४-६४ ई०)
बागों के विपरीत चलने वाले को यवन कहा जाता है, देस्य भी
है। गायों को देवता तथा अंगों को यवन कहा जाता है।

(दसवा पुष्प २६-७-६३ ई०)
जो दूसरों को नष्ट करता है वह दैत्य कहलाता है ।

(तीसरा पुष्प ८-३-६२ ई०)

राक्षस वे हैं जो दूसरों को कष्ट देते हैं । दैत्य थे हैं जो दूसरों की
महत्ता नट करना चाहते हैं। देवता वे हैं जो दूसरों की उन्नति चाहते हैं।
(दसवाँ पुष्प २६-७-६३ ई०)

देवता:
जो देवता प्रकृति के प्राणी होते हैं वे आत्म-विश्वासी होते हैं । वे
इस शरीर को वास्तविकता न दे करके, आत्मा को केन्द्र स्वीकार करके
आगे रमण करते हैं। जो दैत्य प्रकृति के होते हैं वे विना विचारे जब अात्मा
और विज्ञान की चर्चा करते हैं तो वे इसे पाखण्ड बतलाते हैं क्योंकि उनके
लिए तो शरीर का पालन-पोषण करना ही उत्तम है।

(नौवां पुष्प १८-७-६७ ई०)

देवता प्रात काल में अग्नि के द्वारा द्रव्य पदार्थों का पान करते हैं।
वे हर समय दूसरों के कल्याण के लिए विचार करते हैं। दूसरों को
कुछ देते हैं। अपनी त्रुटियों को देखकर दूसरों के गुणों को धारण करते
है। दूसरों की निन्दा नहीं करते । वे आत्मा को व्यवहृतियों को जानते
है। उस इन्द्र से अपने जीवन को नियमित बनाने तथा ज्योति को प्राप्त
करने की प्रार्थना किया करते हैं। (सातवा पुष्प २०-१०-६३ ई०)

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