परमात्मा का ऊंचा(prmatma ka uncha ), part12

हमारे शरीर में नौ द्वार माने गए हैं। ज्ञान-कर्म-उपासना के द्वारा
हम इन नो दारू को जानना चाहिए । इन नौ द्वारों के कार्यों को जानना
तथा इन दीवारों में प्रविष्ट हो करके इस ग्रह को दृष्टिपात करना, यह महान्
परियों का कर्तव्य होता है। जब हम यज्ञोपवीत को परम पवित्र उच्चा
रण करते है तो इसका अभिप्राय यह है कि हमें नौ द्वारों पर संयम करना
चाहिए। जैसे हम अपनी वाणी से प्रवेश में प्राकर अशुद्ध उच्चारण न
करें क्योंकि वाणी भ्रष्ट हो जाएगी, वाक्य शुद्ध हो जाएगा। इसी प्रकार
हो घाण के छिद्र, दा थ्रोतों के छिद्र, दो चक्षों के छिद्र, उपस्थ और गुदा
है। इन नौ द्वारों में नो ही देवता विराजमान हैं। एक-एक स्थान पर दो
दो देवता हैं। जैसे उ।स्थ के द्वार पर जल और भूमि दोनों ही प्रधानता में
परिणत रहते हैं; गुदा के द्वारा जल, पृथ्वी दोनों प्रधान हैं, मुखारविन्द में
अन्तरिक्ष और जल दोनों की प्रधानता है, चक्षुओं में अग्नि और वायु की
प्राभा है । स्रोतों का सम्बन्ध दिशाग्रों से है, अश्विनी कुमार इसके देवता
है। प्रत्येक देवता को जानना है और जान करके भौतिक-विज्ञान तथा
अध्यात्मिक-विज्ञान दोनों का मिलान करके अपने राष्ट्र को पवित्र वनाना
है ।

यज्ञोपवीत को उपनयन भी कहा जाता है । यह इतना महान् है कि
इसको घारण करने के पश्चात् मानव को अपनी वृत्तियों पर, श्राचार-
व्यवहार पर उसका नियन्त्रण होने लगता है। यज्ञोपवीत धारण करके भो
जो मानव दूसरों के मांस को भाषण करते हैं वे नारकीय कहलाते हैं। वे
नारकीय इसलिए वनते हैं क्योंकि ऋषियों का ऋण उनके समीप रहता
है। यदि वह दूसरों की वेदना को अपने में धारण करके अपने उदर में
वारण कर लेते हैं तो उनकी आभा का विनाश हो जाता है। जब हम
परम-पवित्र वनकर यज्ञ के समीप जाते है तो इसका अभिप्राय यह है कि
इन नौ द्वारों पर हमें संयम करना है । नौ द्वारों पर संयम करना हमार
कहा यजमान की कर्म-काण्ड की पद्धति में कहा है।

(तेईसवा पुष्प १३-११-७१ ई०)

| एकपदी का महत्व

यज्ञोपवीत बह पदार्थ है जो हमें परमात्मा के मार्ग में जाने के लिए
1 करता है । इसको धारण करने से परमात्मा का ज्ञान जाना जा
एकता है । यह परम-पवित्र ग्राय्यों का सबसे प्रथम प्रतीक है। जब हम
के न २ पाते। तो एक नाड़ी उसी प्रकार की है। । ।
द रच केला जाता है। उस नाडी का सम्बन्ध हमारी पागा तथा
जन से वो गर्भ का प्रतीक हम बाहर भी धारण करना
र। इस सम्बन्ध आत्मा से होता है परमात्मा से हो जाता है।
इतने हमारे विचार पर होने चाहिए । जब यज्ञोपवीत को धारण र
चलते हैं पर अपने विचारों को पवित्र बनाते हैं तो हमारे गा मा तपा।
इड का सबका विचार आत्मा के द्वारा जाता है चोर पन्तःकरण रूपी
बेनी में विराजमान हो जाता है।

प्रश्न :-वेद ईश्वरीय ज्ञान है। परमात्मा ने वेदों में यज्ञोपवीत का

मंत्र क्यों दिया ?

उतर:-परमात्मा ने सृष्टि के प्रारम्भ में इस यज्ञोपवीत को इसलिए
धारण कराया है कि जिससे आत्मा-परमात्मा को भुला न
दे मोर आत्मा का कल्याण न हो सके। हमें यज्ञोपवीत को
घारण कर परमात्मा के गुण गाते हुए प्रकृति को छोड़कर
परमात्मा की गोद में जाना चाहिए । प्रत्येक माता-पिता
बालक यज्ञोपवीत को धारण कर, उनके विचारों को प्रेरणा
हो । आचार्य पवित्र हो; ब्रह्मचारी हों, उनके विचार ऊंचे
हों। वह शिष्यों के अवगुणों को उनसे लेकर उसमें ज्ञान
का प्रकाश देने वाले हैं।

(आठवां पुष्प १३-११-६३ ई०)

यज्ञशाला में यज्ञोपवीत धारण करने वाले को यज्ञ करने का अधि
कार हो जाता है। यज्ञोपवीत का तात्पर्य है कि यज्ञ के समीप पवित्र होकर
जाना। यज्ञोपवीत परम-पवित्र होने के कारण ही यज्ञ के लिए उसका
महत्व रखा गया है। यज्ञोपवीत उसे धारण करना चाहिए जो तीनों ऋणों
को अपने में ऋण स्वीकार करके उससे उऋण होने का प्रयास करता है।
(सोलहवाँ पुष्प १७-१०-७१ ई०)

द्राक्ष की मात्रा :

रुद्राक्ष की माला प्रत्येक मानव को धारण करनी चाहिए । प्रभु का
नाम छ है, क्योंकि वह पामरों, पापाचारियों तथा अपराधियों को सताने
चला है। उस रुद्राय महिमा के गुणगान गाने वाला रुद्राक्ष की माला को

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