परमात्मा का ऊंचा(prmatma ka uncha ), part28

स्वामी जी का स्वकथित जीवन चरित्र
(सन् १८ ८ ई० से १८७५ तदनुसार सं० १८८१ म १९३१ वि० तक)

बचपन : वैराग्य : गृहत्याग व संन्यास
मेरा वास्तविक वेश्य: देश-सुथार व धर्म-प्रचार–हमसे बहुत लोग पूछते हैं कि हम कैसे जाने कि आप बाय
है। आप अपने इष्ट मित्र भाई बन्युओं के पत्र मंगा दे अथवा किसी की पहचान बता दें ऐसा कहते है इसलिए में उपश
वृत्त बना है। गुजरात देश में दूसरे देशों की अपेण मोह विशेष है। यदि मैं इष्ट मित्र ट़या सम्बन्धियों की पहकट
या पत्रव्यवहार करू तो इससे मुझे बड़ी उपाधि होगी। जिन उपाधियों से मैं छूट गया है, वही ठराधियां (क) पर पीठ
लग जाएगी । यही कारण है कि मैं पक्रादि मंगाने की वेश नहीं करता।
पहले दिन से ही जो मैंने लोगों को अपने पिता का नाम और अपने कुल का निवासस्थान आदि नहीं बताया इसडा
कारण यही है कि मेरा कर्तव्य मुझे इस बात की आज्ञा नहीं देता व्योंकि यदि मेरा कोई सम्बन्धी मेरे इस वृतन में
परिचित हो जाता तो वह अवश्य मुझे खोजने का प्रयास कता और इस प्रकार उनसे दो-चार होने पर मेरा उनके साद ब
पर जाना आवश्यक हो जाता अर्थात एक बार फिर मुझको रुपया, घन हाथ में लेना पड़ता अर्वात् में गृहस्थ हो जाता । टनको
सेवा टहल भी मुझे योग्य होती और इस प्रकार उनके मोह में पड़कर सबके सुधार का वह उनम कार्य, जिसके लिये मेंे
अपने जीवन का अर्पण किया है और जो मेरा वास्तविक मिशन(उदेश्य है, जिसके बदले मैंने अपना जीवन बलिदान करने
की कुछ चिन्ता नहीं की और अपनी आयु को भी तुच्छ जाना और जिसके लिये मैंने अपना सब कुछ बलिदान कर देन
अपना मंतव्य समझा है अर्थात देश का सुधार और धर्म का प्रचार, वह देश यथापूर्व अकार में पा रह जाता।

मेरा जन्म मोरबी (गुजरात) के एक समृद्ध औदीच्य ब्राह्मण के घर सं० १८८१में-संवत् १८८१ बिङ्मो
घग्घा करके गुजरात देश में एक राजस्थान है। उसकी सीमा पर मछ-कांटा नदी के तट पर एक मोरवी नगर है। वह
संवत १८८१ वि० तदनुसार सन् १८२४ में मेरा जन्म हुआ। मैं औदीच्य ब्राह्मण हं यद्यपि औदीच्य ब्राह्मण सामवेदो है।
परंतु मैंने शुक्ल यजुर्वेद पढ़ा था ।
पांच वर्ष की अवस्था से अक्षर-अभ्यास, कुलयाम, रीति-नीतियों मंत्र-श्लोकादि की शिक्षा-(संवत् १८८५
विक्रमी) मैंने पांच वर्ष की अवस्था होने से पूर्व ही देवनागरी अक्षर पढ़ने का आरम्भ कर दिया था और तब से हो मेरे
माता-पिता वृद्ध लोग मुझको कुल धर्म और उसकी रीति सिखलाने लगे और मुझको बड़े स्तोत्र मंत्र, श्लोक तथा उनको

काया कण्ठस्थ कराया करते थे।

आठवें वर्ष में यजोपवीतवारण के पश्चात् गायत्री तथा सन्थ्योपासन विधि की शिक्षा तथा शैव संस्कार इतने
ा प्रयत्न (संवत १८८८ वि०)--आठवें वर्ष में मेरा यज्ञोपवीत हुआ और उसी समय से गायत्री, सन्ध्योपासन करने की
घि सिखलायी गई और प्रथम रुद्री और तत्पश्चात् यजुर्वेद की संहिता आरम्भ की गई। इनके पढ़ानेवाले पिता जी

News Updates

Here you find some awesome old untold Stories about sports Featured on annews24.com. So Stay tune with us.

No comments:

Post a Comment