परमात्मा का ऊंचा(prmatma ka uncha ), part11

प र सकेगा। यज्ञोपवीत के तीन तार मानव के ऊपर तीन
' के प्रतीक है—ऋषि-ऋण, मातृ-ऋण प्रौर देव-ऋण, जो इन ऋणों
सं उच्चारण होने का संकल्प करता है, वही प्रार्य है।
(देव पुष्य २६-७-६३ ई०)
ज्ञोपवीत ऋणों का प्रतीक :
त्रेता काल में महर्षि लोमश, महर्षि नारद, काकभुशुंडि कथा गरुड़।
हुए कहा था कि
गादि ऋषियों का समाज हुआ। काकभुशुण्डि जी ने प्रश्नों का उत्तर देते
हमारे ऊपर तीन ऋण हैं, उनसे उऋण होना अनिवार्य है जो देव
वियाग्रा के ऋण से उऋण होने का प्रयास करता है जो देवकन्या देवताओं
ही पूजा करने वाली हो वे यज्ञोपवीत के पात्र हैं। एक धागा ऋषि-ऋण या
देव-ऋण का प्रतीक है। ऋषि-ऋण वह पदार्थ है कि ऋषियों ने जो हमें
आदेश दिया, जो हमारे लिए मर्यादा बधी, उस मर्यादा पर चलना, उसका
आदर करना और उस पर अपना जीवन बनाना, यह हमारे ऊपर एक
ऋण है इससे उऋण होने का प्रयास कर

| दुसरा देव-ऋण है। देवता वे हैं जो हमें देते हैं लेते नहीं, वे हमें
जीवन, आयु और मानवता देते हैं। इनकी पूजा करने के लिए यज्ञ करना
चाहिए । सूर्य आदि ग्रहों तक सुगन्धि पहुंचकर हम मनोकामना के अनुकूल
तेज प्राप्त करें, इससे हमें सब विज्ञान प्रा जाएगा।
तीसरा मातृ-ऋण है। जिस माता के गर्भ से हमारा जीवन वनकर
हम ऋषित्व को प्राप्त हो जाते हैं, वह माता पूजनीय है। कीड़ों को जन्म
| देने वाली नहीं । पृथ्वी माता है, संस्कृति माता है। इनका भी आदर करना
है।
(दसवाँ पुष्प २६-७-६३ ई०)

जिस समय यजमान यज्ञशाला में विराजमान होता है तो वह यज्ञो
'वात को धारण करता है। वह यज्ञोपवीत परम-पवित्र कहलाता है ।
का उपवीत है। ऋण को उतारने के लिए उपवीत का विधान किया

सता है

जो यज्ञ के समीप विराजमान होता है उसको ऋणों से उऋण ह ने
प्रयास करना चाहिए । जब तीन ऋणों से उत्ण हो जाते हैं तो उस
धपय यज्ञ के समीप जाने का हमें प्रकार होता है। परम-पवित्र का अ्भि-
प्राय यह है कि मन-वचन-कर्म से पवित्र हो जाएं, यज्ञ से पवित्र हो जाएं ।
बिरहा-विद्या से हमारा जीवत लदा हुआ होना चाहिए । ब्रह्मा-विद्या में लिप्त
हमारे शरीर में ही तो परम-पवित्र होती है।
जैसे मूर्य परम-पवित्र है, प्रकाश देने वाला है उसी प्रकार यज्ञोपवीत
भी परम-प्रकाश का ज्ञान कराता है। इसके तीन धागे हमें तीन ऋणों का
ज्ञान कराते हैं और हमें उन होने के लिए प्रेरित करते है। यह प्राय
का भूषण है । इसका पदाधिकारी बनने के लिए यह प्रावश्यक श्ै कि ग्रार्य
बनकर सूर्य की भांति वेद-रूपी प्रकाश का प्राधिकारी वने ।

(चौथा पुष्प २८-७-६३ ई०)
यज्ञोपवीत का विज्ञान :

ब्राह्मण ब्रह्मचारी को यज्ञोपवीत देते समय कहते हैं कि हे ब्रह्मचारी
इस यज्ञोपवीत की एक ब्रह्म-ग्रंथि मानी जाती है। इसमें तीन घाग माने
जाते हैं। एक-एक धागे में तीन-तीन धागों की व्यवहृतियां होती है। इस
परम-पवित्र यज्ञोपवीत में संसार का ज्ञान-विज्ञान प्रोत-प्रोत रहता है ।।
आत्मा-परमात्मा और प्रकृति इन तीनों से ही संसार का निर्माण होता है ।
इन तीनों के सूचक तोन धागे हैं। तीन ही प्रकार के गुण होते हैं-रजोगुण,
तम गुण, सतोगुण । तीन ही प्रकार के प्राणी होते हैं रज, तम, सत ।
तीन ही प्रकार की विद्याएं हैं—ज्ञान, कर्म, उपासना । सुरागे तीन धागों को
तीन व्यवहृतियां हैं, ये इसकी सूचक हैं कि :

शरीर में नौ द्वार हैं। ३ X ३=९ व्यवहृत का प्रत्येक एक द्वार की
सूचक हैं। इनके संगठन ऐसे माने गए हैं जैसे दा चक्ष और एक श्रोत्र=
एक व्यवहृति; दो प्राण और एक श्रोद=एक व्यवहृति; मुख, उपस्थ,
ग्रीवा=एक व्यवहति । द्रव इन 0 द्वारों पर शासन करता हुआ ब्रह्मचारी
इनकी तीन व्यवहृतियां वना लेता है और आगे सुक्ष्मता में जाकर इन 8
द्वारों की केवल एक ही ग्रन्थि बन जाती है तो उसे ब्रह्मग्रन्थि कहते हैं ।
ब्रह्म-ग्रंथि होकर, परमात्मा-परमात्मा-प्रकृति, तीनों सुगठित होकर यह
ग्रात्मा-परमात्मा के ग्राउंड का अनुभव करता है । हे ब्रह्मचारी ! 1
इस परम-पवित्र यज्ञोपवीत को धारण करके, अपने मानवत्व को जान,
इस शरीर रूपी अयोध्यापुरी को जान ।

(सातवा

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