परमात्मा का ऊंचा(prmatma ka uncha ), part10

प्रतीत होता है कि इनकी उत्पत्ति तथा विकास केवल आभासमात्र,
१-जैसे औषधियों का मूल जल, २-जल का मूल अग्नि, ३-अग्नि का मल
'वायु तथा ४-वायु का मूल अंतरिक्ष है ।
| अंतरिक्ष से पुष्टि होने पर नाना वनस्पतियां उत्पन्न होती हैं। इन
श्रौषधियों को एकत्रित करके यज्ञशाला में अध्वर्यु इनका स्वामी बनकर
‘इदन्नमम' की भावना से सबको यज्ञ रूप स्वीकार करके, सबमें वितरित
कर देता है, जो जिसका भाग होता है।

२-मानव शरीर में ‘उदय' नाम का प्राण अध्वर्यु का कार्य करता
है। इसका सम्वन्ध समान' नाम के प्राण से है। जब उदान समान को
त्याग देता है तो वह ज्ञान की ‘आकृति' नाम की प्रतिभा में रमण करने
लगता है। उसे अपने में अपत स्वीकार करता हुआ अपने में ही परिणत
कर लेता है तथा यौगिकता के अनुसार उसका वितरण भी हो जाता है।
इस प्रकार उदान-प्राण, समान-प्राण को त्याग कर वितरण करने वाला
अध्वर्यु का ही कार्य करता है।

३-अध्वर्यु उसे कहते हैं जो औषधियों को परमात्मा का मूलक
स्वीकार करके उनके स्थूलत्व को परमात्मा को ही अपना कर देता है।
४-अध्वर्यु उसे कहा जाता है जो आत्मवेत्ता, आत्मज्ञान में इन्द्रियो ।
तथा वाह्य-जगत् के विषयों को सामग्री बना लेता है । वह अपने विषय
की सामग्री के अनुकूल ही वस्तुओं की सामग्री बना करके उसको ज्ञान-रूपा
अर्थात् प्रात्म-रूपी अग्नि में, ब्रह्म-रूपी अग्नि में, ब्रह्मज्ञान-रूपी प्रदीप्त
अग्नि में जो आहुति देता है उसे अध्वर्यु कहते हैं ।

५-अध्वर्यु उसे कहते हैं जिसका व्यापक हृदय होता है, जिस प्रकार
वनस्पतियां दूसरों के उपकार के लिए ही होती हैं, अपने लिए ‘इदन्नमम
में हो संतुष्ट रहती हैं। इसी प्रकार अध्वर्यु ब्रह्मवेत्ता बनता हुआ, ब्रह्म
परिणत होता हुआ यह स्वीकार करने लगता है कि इन्द्रियों पर भी मेरा
स्वामित्व नहीं है। इनसे तो केवल कर्तव्य पालन करना है, इनके विषय
की सामग्री बना करके वह यज्ञशाला में उनकी आहुति देता है ।

६-अध्वर्यु उसको कहा जाता है जो यजमान, ब्रह्मा, होता शाद
इन सबकी प्रवृत्तियों को जानता हो, ब्रह्मत्व में रमण करने वाला हो
जिसने ब्रह्म में निष्ठा बन गई हो, जिसका हृदय अगम्य बन गया हो ।
७-अध्वर्यु उसको कहते हैं जिसको संसार में किसी प्रकार का भय न
। उसके लिए प्राणीमात्र एक ही प्रात्मा सर्वभूतिप' बन जाते हैं । अतः
जो सब भूत प्राणियों में एक ब्राह्मण की चेतना स्वीकार करने वाला हो उसको
अद्वयं कहा जाता है ।
(बिसवां पुष्प १९-७-७० ई०)

५-उद्गाता
| गाना गाने वाले को उद्गाता कहते हैं, जो वेदों का स्वर सहित जटा
पाठ, धन-पाठ, माला-पाठ, उदात्त, अनुदात्त ग्रादि नाना प्रकार से पठन
पाठन करता है उसे उद्गाता कहते हैं । अ्र्थात् जो ऊच्र्गति वाला गान
गाने वाला हो, ध्रुव-गति का नहीं। वह उद्यान ऐसा है जैसे सृष्टि के
प्रारम्भ में परमात्मा ने ऋत और सत्य के ऊपर प्रपन्ना विचार व्यक्त किया
था। ऋत और सत्य दोनों ही उसमें परिणत रहते थे दोनों में ही विचित्रता
सदैव रही।

उद्गाता उसे कहते हैं जो उद गीत गाने वाला हो, उद गमता देने
वाला हो, जो हृदय और आत्मा से गाना गाता है । आत्मा और हृदय का
गान पक्षियों के अन्तःकरण को भी पवित्र कर देता है।

सोमकेतु ऋषि ने वृष्टि-यज्ञ करते समय जो उद्गान गाया तो उससे
मनराज, पक्षीगण तथा प्रकृति और देवता भी प्रसन्न हो गए और वर्षा
होने लगी। इस पर बालिका ने, (अपने गुरु) महर्षि श्रृंगी जी से प्रश्न
किया।

प्रश्न : हृदय का उद्गान तो सभी करते हैं। एक बालक जव
याकुल होता है तो माता द्वारा लोरियों का पालन कराने पर शान्त हो जाता
है । उसको पुनः विडम्बना होती है। किन्तु इन मृगराजों तथा पक्षियों का
हृदय कसे तृप्त हुआ होता है कि इस गाने से प्रभावित होकर सान्तवना को
प्राप्त हो जाते हैं ?

महर्षि श्रृंगी जी ने उत्तर दिया
उत्तर : मानव के हृदय को ध्यान, तप और यौगिक क्रिया ग्रहों से
पाया जाता है। जिस प्रकार एक सुयोग्य माता अपने ग्राहार-व्यवहार
या विचारों से अपने गर्भावस्था में वालक को तपा देती है, ब्रह्म का चिन्तन
ती हुई वह बालक को गर्भ में ही ऊंचा बना देती है, इसी प्रकार
"पुरुषों के सत्सङ्ग में ब्रह्मचारी तप जाता है। उसका हृदय इतना पवित्र

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